बिश्केक। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनेक्टिविटी परियोजनाओं को लेकर भारत का रुख एक बार फिर साफ कर दिया। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी में पीएम मोदी ने कहा कि क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने वाली परियोजनाएं तभी सार्थक हैं, जब उनमें सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाए।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया, लेकिन उनके इस बयान को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से गुजरने वाले CPEC को लेकर भारत की पुरानी आपत्ति से जोड़कर देखा जा रहा है।
मोदी का संदेश क्या था?
SCO के 26वें शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने संगठन के लिए तीन प्रमुख स्तंभों—Security, Connectivity और Opportunity—पर जोर दिया।
कनेक्टिविटी के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि भारत उन सभी प्रयासों का समर्थन करता है, जो बाजारों को जोड़ते हैं, व्यापार को आसान बनाते हैं और विकास के नए रास्ते खोलते हैं। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी परियोजनाओं में सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान बेहद जरूरी है।
प्रधानमंत्री ने इसे SCO चार्टर की मूल भावना से भी जोड़ा।
यही वह हिस्सा है जिसे चीन और CPEC के संदर्भ में खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
CPEC का नाम नहीं, लेकिन निशाना साफ?
भारत लंबे समय से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करता रहा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि CPEC का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरता है।
भारत की आपत्ति का आधार यही है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र से गुजरने वाली इस परियोजना में भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े सवाल शामिल हैं।
ऐसे में SCO जैसे बहुपक्षीय मंच पर प्रधानमंत्री का यह कहना कि कनेक्टिविटी परियोजनाओं को संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। द वीक ने भी मोदी के बयान को चीन के लिए अप्रत्यक्ष संदेश के तौर पर देखा है।
हालांकि, यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि पीएम मोदी ने अपने भाषण में CPEC का नाम नहीं लिया था। इसलिए इसे सीधे तौर पर CPEC पर दिया गया बयान कहने के बजाय भारत की व्यापक कनेक्टिविटी नीति के संदर्भ में देखना ज्यादा सटीक होगा।
शी जिनपिंग की मौजूदगी में क्यों अहम था बयान?
इस बयान की टाइमिंग इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि SCO सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी मौजूद थे।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और क्षेत्रीय रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच दोनों देशों के नेता एक ही बहुपक्षीय मंच पर मौजूद हैं। ऐसे में मोदी का संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर जोर देना भारत की उस नीति के अनुरूप है जिसमें वह आर्थिक और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं का समर्थन तो करता है, लेकिन उनकी शर्तों और मार्गों को लेकर अपनी संप्रभु चिंताओं को भी स्पष्ट रखता है।
SCO सम्मेलन में मोदी और शी के बीच बातचीत और अन्य नेताओं के साथ बैठकों पर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर रही।
कनेक्टिविटी के साथ चाबहार और नए रास्तों पर भारत का जोर
पीएम मोदी ने केवल आपत्ति दर्ज कराने तक अपनी बात सीमित नहीं रखी। उन्होंने कनेक्टिविटी को क्षेत्रीय विकास का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए व्यापार और बाजारों को जोड़ने वाले नए रास्तों पर जोर दिया।
भारत पहले से ही चाबहार पोर्ट और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) जैसे विकल्पों को मध्य एशिया और अन्य क्षेत्रों से संपर्क बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण मानता रहा है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले समय में कनेक्टिविटी केवल सड़क, रेल और हवाई गलियारों तक सीमित नहीं रहेगी। इसमें कस्टम प्रक्रियाओं को आसान बनाना, डिजिटल दस्तावेजों को बढ़ावा देना और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को अधिक प्रभावी बनाना भी शामिल होगा।
आतंकवाद पर भी पाकिस्तान को घेरा
SCO में प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर भी कड़ा संदेश दिया। उन्होंने आतंकवाद के वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ और आतंकियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने वाले पूरे तंत्र को खत्म करने की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे मापदंड की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया जब पाकिस्तान SCO की अध्यक्षता संभाल रहा है और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी सम्मेलन में मौजूद थे।
इस तरह सम्मेलन में भारत की तरफ से सुरक्षा और कनेक्टिविटी—दोनों मोर्चों पर संदेश काफी स्पष्ट रहा।
भारत की रणनीति: संपर्क भी, संप्रभुता भी
SCO में प्रधानमंत्री मोदी का भाषण भारत की विदेश नीति के दो महत्वपूर्ण पहलुओं को साथ लेकर चलता दिखाई दिया—क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना और अपने रणनीतिक हितों पर स्पष्ट रुख बनाए रखना।
भारत कनेक्टिविटी और व्यापार के विस्तार का समर्थन करता है, लेकिन साथ ही उसका कहना है कि किसी भी परियोजना के रास्ते में संबंधित देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
यही वजह है कि शी जिनपिंग की मौजूदगी में दिया गया मोदी का यह संदेश कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। CPEC का नाम लिए बिना भारत ने अपनी वह पुरानी आपत्ति दोहरा दी, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरने वाली परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से उसकी नीति का हिस्सा रही है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि चीन और पाकिस्तान इस संदेश को किस तरह लेते हैं और SCO के मंच पर कनेक्टिविटी, सुरक्षा तथा क्षेत्रीय संप्रभुता के मुद्दों पर आगे किस तरह की चर्चा होती है।


