राजनीति

खरगे के ‘अपमान’ को कांग्रेस क्यों नहीं छोड़ रही? उत्तराखंड से यूपी-पंजाब और 2029 तक की सियासी रणनीति

नई दिल्ली। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद कथित ‘शुद्धिकरण’ का मामला अब महज एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है। कांग्रेस ने इसे दलित सम्मान और सामाजिक न्याय से जोड़ते हुए देशव्यापी राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। राहुल गांधी से लेकर पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता लगातार इस मुद्दे पर बीजेपी को घेर रहे हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि खरगे के दलित होने की वजह से उनकी रैली के बाद कार्यक्रम स्थल का ‘शुद्धिकरण’ कराया गया। दूसरी ओर, आयोजकों और बीजेपी ने इस आरोप से इनकार किया है। उनका कहना है कि मंच पर गंदगी रह जाने के कारण हवन कराया गया था और इसे जातिगत भेदभाव से जोड़ना गलत है।

लेकिन राजनीतिक सवाल यह है कि कांग्रेस इस मुद्दे को लगातार क्यों आगे बढ़ा रही है? पार्टी के मौजूदा तेवरों को देखें तो इसके पीछे केवल खरगे के सम्मान का सवाल नहीं, बल्कि दलित राजनीति के जरिए अगले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए व्यापक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश भी दिखाई देती है।

शुरुआत उत्तराखंड से हुई, मुद्दा राष्ट्रीय बना

हल्द्वानी में 8 अगस्त को खरगे की रैली के बाद कथित तौर पर 11 अगस्त को कार्यक्रम स्थल पर ‘शुद्धिकरण’ के लिए हवन कराया गया। कांग्रेस ने इसे गंभीरता से लेते हुए आरोप लगाया कि एक दलित नेता के कार्यक्रम के बाद इस तरह की रस्म सामाजिक भेदभाव वाली मानसिकता को दर्शाती है।

मामला आगे बढ़ा तो राहुल गांधी ने भी इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कथित शुद्धिकरण को छुआछूत की मानसिकता से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग की। इसके बाद कांग्रेस ने इसे पार्टी अध्यक्ष तक सीमित रखने के बजाय दलित सम्मान और संविधान से जोड़ना शुरू कर दिया।

बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश बताया है। पार्टी ने कुछ स्थानीय लोगों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि घटना को जिस तरीके से पेश किया जा रहा है, वह वास्तविकता से अलग है।

खरगे खुद भी नाराज, फिर राहुल ने संभाला मोर्चा

कांग्रेस की रणनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब पार्टी के भीतर यह सवाल उठा कि खरगे से जुड़े इतने संवेदनशील मामले पर पार्टी नेताओं की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत कमजोर क्यों रही।

इसके बाद कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे को ज्यादा मजबूती से उठाने की मांग हुई। राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से मोर्चा संभाला और मामला तेजी से राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया। अब कांग्रेस नेता इसे केवल उत्तराखंड की घटना नहीं, बल्कि दलित सम्मान और सामाजिक बराबरी के बड़े सवाल के रूप में पेश कर रहे हैं।

कांग्रेस का बड़ा दांव: ‘दलित खतरे में हैं’

राजनीतिक रूप से कांग्रेस के इस अभियान का सबसे बड़ा लक्ष्य एक नया सामाजिक-राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना माना जा रहा है।

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और विपक्षी दलों ने संविधान तथा आरक्षण से जुड़े मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया था। अब कांग्रेस उसी राजनीतिक जमीन को आगे बढ़ाते हुए दलित सम्मान और कथित सामाजिक भेदभाव को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।

लाइव हिन्दुस्तान की राजनीतिक रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी की नजर अगले विधानसभा चुनावों के साथ 2029 के लोकसभा चुनाव पर भी है। रिपोर्ट में इसे ‘दलित खतरे में हैं’ जैसे व्यापक नैरेटिव के रूप में स्थापित करने की संभावित रणनीति से जोड़ा गया है।

हालांकि, यह कांग्रेस की रणनीति के राजनीतिक विश्लेषण का हिस्सा है; पार्टी ने आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा है कि खरगे प्रकरण को केवल चुनावी रणनीति के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है।

यूपी क्यों है कांग्रेस की नजर में?

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। राज्य में दलित मतदाताओं का बड़ा सामाजिक आधार है और कई विधानसभा क्षेत्रों में उनका वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि दलित राजनीति की जमीन पहले से ही कई दलों के बीच बंटी हुई है। समाजवादी पार्टी का अपना सामाजिक समीकरण है, जबकि बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से दलित राजनीति की प्रमुख ताकत रही है। इसके अलावा चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी इसी राजनीतिक क्षेत्र में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है।

ऐसे में कांग्रेस अगर दलित वोटों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है तो उसे सिर्फ बीजेपी विरोधी नारों से आगे जाकर जमीनी संगठन और विश्वसनीय नेतृत्व भी खड़ा करना होगा।

पंजाब में दांव और भी बड़ा

पंजाब कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में दलित आबादी का अनुपात देश के कई बड़े राज्यों की तुलना में काफी अधिक है।

ऐसे में दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन यहां भी पार्टी के सामने चुनौती कम नहीं है। स्थानीय राजनीतिक समीकरण, आम आदमी पार्टी की मौजूदगी और दलित राजनीति में अन्य दलों की सक्रियता कांग्रेस के लिए मुकाबला कठिन बनाती है।

यही वजह है कि खरगे के मुद्दे को कांग्रेस केवल उत्तराखंड तक सीमित रखने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की कोशिश कर रही है।

बीजेपी भी तैयार कर रही है जवाबी नैरेटिव

कांग्रेस के हमले के बीच बीजेपी ने भी पलटवार शुरू कर दिया है। बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर दलित राजनीति को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।

पार्टी ने हल्द्वानी मामले में कांग्रेस के आरोपों को चुनौती देते हुए कहा है कि घटना का जातिगत अर्थ निकालना सही नहीं है। बीजेपी का कहना है कि स्थानीय स्तर पर मौजूद तथ्यों और संबंधित लोगों के बयानों को भी देखा जाना चाहिए।

यानी अब मुकाबला सिर्फ घटना को लेकर नहीं है। असली लड़ाई यह तय करने की है कि इस घटना की राजनीतिक व्याख्या कौन-सा पक्ष जनता के सामने स्थापित कर पाता है।

कांग्रेस का मुद्दा सड़क से संसद तक

मामला अब संगठनात्मक स्तर से निकलकर सड़क तक पहुंच चुका है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कई जगह प्रदर्शन किए हैं और कथित घटना के खिलाफ शिकायतें भी दी हैं।

राहुल गांधी के खिलाफ मामले और एफआईआर को लेकर भी कांग्रेस ने विरोध दर्ज कराया है। पार्टी ने इसे दलित सम्मान से जुड़े मूल मुद्दे से जोड़कर देखा है और राष्ट्रव्यापी विरोध का ऐलान किया है।

इससे विवाद का दायरा और बड़ा हो गया है।

क्या यह रणनीति कांग्रेस के लिए काम करेगी?

यही सबसे बड़ा सवाल है।

कांग्रेस के सामने 2024 के चुनाव का उदाहरण है, जब संविधान और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों ने विपक्ष को राजनीतिक लाभ पहुंचाया था। पार्टी अब उसी तरह के सामाजिक नैरेटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है।

लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों में केवल नैरेटिव पर्याप्त नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में उसे संगठन, उम्मीदवार और स्थानीय सामाजिक समीकरणों पर भी काम करना होगा। पंजाब में भी दलित मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों से आगे बढ़कर स्थानीय मुद्दों को साधना पड़ेगा।

इसके अलावा बीजेपी के पास भी अपने जवाबी नैरेटिव और संगठन की मजबूत मशीनरी है।

2029 की तैयारी अभी से?

खरगे प्रकरण की राजनीति को अगर व्यापक नजरिए से देखें तो कांग्रेस के लिए यह 2027 के चुनावों से आगे की तैयारी भी हो सकती है।

मल्लिकार्जुन खरगे स्वयं दलित समुदाय से आने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। पार्टी के पास उन्हें सामाजिक न्याय, संविधान और प्रतिनिधित्व के बड़े नैरेटिव के केंद्र में रखने का राजनीतिक अवसर है।

लेकिन इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस इसे केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रखती है या वास्तव में दलित समुदाय से जुड़े रोजगार, शिक्षा, प्रतिनिधित्व, सामाजिक सुरक्षा और स्थानीय स्तर के मुद्दों को भी अपने राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता देती है।

हल्द्वानी का विवाद इसलिए अब केवल ‘शुद्धिकरण’ की घटना नहीं रह गया है। यह बीजेपी और कांग्रेस के बीच उस बड़ी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बन चुका है, जिसमें दलित वोट, संविधान और सामाजिक न्याय आने वाले चुनावों में अहम भूमिका निभा सकते हैं।