नई दिल्ली | राजनीतिक डेस्क
केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के दो दिन बाद धर्मेंद्र प्रधान जब संसद पहुंचे तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सांसदों ने उनका जोरदार स्वागत किया। संसद परिसर में कई सांसदों ने ‘धर्मेंद्र प्रधान जिंदाबाद’ के नारे लगाए और उन्हें पारंपरिक सम्मान स्वरूप ओडिशा की पगड़ी पहनाकर अभिनंदन किया। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब उनके इस्तीफे को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में बहस जारी है।
संसद परिसर में दिखा समर्थन
सोमवार को संसद भवन पहुंचते ही धर्मेंद्र प्रधान का भाजपा और एनडीए के कई सांसदों ने गर्मजोशी से स्वागत किया। सांसदों ने उनके समर्थन में नारे लगाए और उनसे हाथ मिलाकर उनका उत्साहवर्धन किया। कुछ सांसदों ने इसे उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और संगठनात्मक योगदान के प्रति सम्मान बताया।
इस्तीफे के बाद पहला संसदीय दिन
शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा स्वीकार होने के बाद यह धर्मेंद्र प्रधान की संसद में पहली उपस्थिति थी। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर उनका इस्तीफा स्वीकार किया था। इसके बाद केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।
भाजपा ने जताया भरोसा
भाजपा के कई नेताओं और सांसदों ने सार्वजनिक रूप से धर्मेंद्र प्रधान के प्रति समर्थन व्यक्त किया। पार्टी नेताओं का कहना है कि उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों में रहते हुए कई महत्वपूर्ण योजनाओं को आगे बढ़ाया है और उनका अनुभव संगठन के लिए आगे भी महत्वपूर्ण रहेगा। संसद में उनका स्वागत इसी विश्वास का प्रतीक माना जा रहा है।
विपक्ष ने उठाए सवाल
दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर सरकार पर निशाना साधना जारी रखा है। विपक्ष का आरोप है कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार को यह कदम उठाना पड़ा। विपक्ष ने संसद के भीतर और बाहर सरकार से शिक्षा क्षेत्र में व्यापक सुधारों की मांग भी दोहराई।
आगे क्या?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में धर्मेंद्र प्रधान के प्रति भाजपा सांसदों का सार्वजनिक समर्थन यह संकेत देता है कि पार्टी नेतृत्व अब भी उन पर भरोसा बनाए हुए है। दूसरी ओर, शिक्षा मंत्रालय में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब सरकार के सामने परीक्षा प्रणाली में सुधार, छात्रों का विश्वास बहाल करने और लंबित शिक्षा संबंधी मुद्दों पर ठोस निर्णय लेने की चुनौती होगी। आने वाले दिनों में संसद के भीतर इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस जारी रहने की संभावना है।


