जयपुर/भरतपुर। राजस्थान के नगर निकाय चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की शहरी राजनीति की तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है। 309 नगरीय निकायों में हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर बढ़त बनाई है, लेकिन इन नतीजों की सबसे दिलचस्प कहानी सिर्फ बीजेपी-कांग्रेस की टक्कर नहीं है। कई शहरों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए दोनों बड़े दलों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह शहर भरतपुर में देखने को मिला, जहां 65 में से 36 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत या बढ़त दर्ज कर राजनीतिक समीकरण ही बदल दिए।
जयपुर में बीजेपी ने हासिल किया बहुमत का आंकड़ा
राजस्थान की सबसे बड़ी नगर निगमों में शामिल जयपुर में बीजेपी ने स्पष्ट बढ़त के साथ बोर्ड बनाने की स्थिति मजबूत कर ली है। 150 वार्डों वाले जयपुर नगर निगम में बीजेपी ने 78 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को 53 सीटें मिलीं। 15 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। उपलब्ध नतीजों के मुताबिक बीजेपी 78 सीटों के साथ बहुमत के जरूरी 76 के आंकड़े को पार कर चुकी है।
जयपुर का नतीजा बीजेपी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजधानी का नगर निगम राज्य की शहरी राजनीति में प्रतीकात्मक और व्यावहारिक, दोनों लिहाज से खास महत्व रखता है। हालांकि कुछ वार्डों में पुनर्मतदान की प्रक्रिया के कारण हर सीट की तस्वीर को पूरी तरह अंतिम मानने से पहले निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। रिपोर्टों के मुताबिक चार वार्डों के कुछ बूथों पर री-पोलिंग प्रस्तावित है।
जयपुर में चुनाव का एक बड़ा उलटफेर पूर्व मेयर ज्योति खंडेलवाल की हार रही। वार्ड 110 में कांग्रेस की सुनीता मेथी ने उन्हें 4,866 वोट हासिल कर हराया, जबकि खंडेलवाल को 2,160 वोट मिले। यह नतीजा राजधानी की स्थानीय राजनीति में व्यक्तिगत प्रभाव और पार्टी संगठन, दोनों के लिए महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
भरतपुर में निर्दलीयों ने दोनों दलों को पीछे छोड़ा
अगर जयपुर बीजेपी की सबसे बड़ी सफलता वाली तस्वीर पेश करता है, तो भरतपुर इसके बिल्कुल उलट एक अलग राजनीतिक कहानी लिखता है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह शहर माने जाने वाले भरतपुर नगर निगम में 65 वार्ड हैं। यहां निर्दलीय प्रत्याशी 36 वार्डों में जीत हासिल करने या बढ़त बनाने में सफल रहे। बीजेपी के खाते में 20 और कांग्रेस के खाते में 7 वार्ड आए, जबकि BSP और RLP को एक-एक सीट मिली।
भरतपुर के नतीजे इसलिए खास हैं क्योंकि यहां निर्दलीयों का आंकड़ा बीजेपी और कांग्रेस, दोनों से काफी आगे निकल गया। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी निर्दलीय एक राजनीतिक खेमे के साथ हैं। बल्कि स्थानीय निकाय चुनावों में यह परिणाम बताता है कि कई वार्डों में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय समीकरण, जातीय-सामाजिक नेटवर्क और वार्ड स्तर का संगठन पार्टी के चुनाव चिह्न से भी ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
भरतपुर में चुनाव से पहले बीजेपी के भीतर टिकट वितरण को लेकर असंतोष और कुछ पुराने नेताओं के निर्दलीय मैदान में उतरने की खबरें भी सामने आई थीं। ऐसे में परिणामों को केवल बीजेपी बनाम कांग्रेस के नजरिए से देखना तस्वीर का एक हिस्सा ही होगा।
राजस्थान की पूरी तस्वीर में भी BJP आगे
राजस्थान के 309 शहरी निकायों में कुल 10,245 पार्षद पदों के लिए चुनाव हुआ। इनमें 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाएं शामिल थीं। मतदान 9 और 11 सितंबर को दो चरणों में कराया गया था और मतगणना 14 सितंबर को हुई। राज्य में 1.44 करोड़ से ज्यादा मतदाता इस चुनाव में वोट डालने के पात्र थे।
उपलब्ध ताजा आंकड़ों के अनुसार बीजेपी ने 4,171 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस 3,597 वार्डों में विजयी रही। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी 2,272 वार्डों में जीत हासिल कर अपनी ताकत दिखाई। इसके अलावा RLP, CPI(M), BSP, AAP और BAP जैसे दलों ने भी कुछ वार्डों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
इन आंकड़ों को सिर्फ सीटों की संख्या के तौर पर देखने के बजाय स्थानीय सत्ता के गणित के संदर्भ में देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। कई नगर निकायों में बीजेपी या कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है और वहां निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
जोधपुर और दूसरे बड़े शहरों में मुकाबला दिलचस्प
राजस्थान के दूसरे बड़े नगर निगमों में भी तस्वीर एकतरफा नहीं रही। जोधपुर में बीजेपी और कांग्रेस के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखने को मिला, जहां दोनों दलों ने 44-44 वार्ड जीते और 10 निर्दलीय पार्षद भी विजयी रहे। ऐसे में यहां बोर्ड गठन के लिए निर्दलीयों की भूमिका अहम हो सकती है।
उधर उदयपुर में बीजेपी ने 80 में से 53 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। भीलवाड़ा में भी बीजेपी ने 70 में से 45 वार्ड जीतकर मजबूत स्थिति बनाई, जबकि 100 सदस्यीय कोटा नगर निगम में बीजेपी ने 53 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया। बीकानेर में कांग्रेस ने बढ़त बनाते हुए नगर निगम में अपनी स्थिति मजबूत की।
अजमेर और पाली में भी कांग्रेस ने मजबूत प्रदर्शन किया है। पाली के 65 वार्डों में कांग्रेस को 29, बीजेपी को 21 और निर्दलीयों को 15 सीटें मिलीं। इस तरह राजस्थान की शहरी राजनीति में कई शहरों ने बीजेपी के पक्ष में स्पष्ट जनादेश दिया, तो कई जगह कांग्रेस और निर्दलीयों ने मुकाबला पूरी तरह खुला रखा।
2028 से पहले बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक संकेत
राजस्थान के इन निकाय चुनावों को 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षण के तौर पर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली बीजेपी के लिए राजधानी जयपुर समेत कई बड़े शहरी निकायों में मजबूत प्रदर्शन संगठन के लिए सकारात्मक संकेत है। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए बीकानेर, अजमेर, पाली जैसे शहरों का प्रदर्शन यह बताता है कि पार्टी का शहरी आधार पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है।
लेकिन इन चुनावों का सबसे बड़ा संदेश शायद निर्दलीयों की भूमिका से जुड़ा है। भरतपुर में 36 वार्डों में निर्दलीयों की जीत या बढ़त और जोधपुर जैसे शहरों में उनकी निर्णायक संख्या बताती है कि स्थानीय चुनावों में पार्टी से इतर स्थानीय चेहरा और व्यक्तिगत नेटवर्क अब भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
अब अगली नजर मेयर की कुर्सी पर
पार्षदों के नतीजे आने के बाद अब राजस्थान की शहरी राजनीति का अगला चरण शुरू होगा। मेयर और अन्य प्रमुख पदों के चुनाव 21 सितंबर को प्रस्तावित हैं, जबकि डिप्टी मेयर और संबंधित पदों के चुनाव 22 सितंबर को होंगे। इसलिए जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, वहां अगले कुछ दिनों में पार्षदों की लामबंदी, समर्थन और बोर्ड गठन को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होना तय माना जा रहा है।
कुल मिलाकर राजस्थान के निकाय चुनावों ने बीजेपी को राज्य की शहरी राजनीति में बढ़त जरूर दी है, लेकिन भरतपुर और जोधपुर जैसे शहरों ने यह भी दिखाया है कि स्थानीय सत्ता का अंतिम समीकरण हमेशा सिर्फ बीजेपी बनाम कांग्रेस से तय नहीं होता। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि निर्दलीय पार्षद किस ओर जाते हैं और कितने नगर निकायों में वे सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखते हैं।


