नई दिल्ली/वॉशिंगटन | अंतरराष्ट्रीय डेस्क
अमेरिका ने वैश्विक व्यापार नीति में बड़ा बदलाव करते हुए भारत सहित 60 देशों के आयातित उत्पादों पर नया ‘फोर्स्ड लेबर टैरिफ’ (Forced Labour Tariff) लागू करने की घोषणा की है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कदम उन देशों पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया है, जहां कथित तौर पर जबरन श्रम (Forced Labour) से जुड़े उत्पादों की रोकथाम और निगरानी पर्याप्त नहीं मानी गई।
हालांकि भारत के लिए राहत की बात यह रही कि शुरुआती प्रस्तावित 12.5% शुल्क की जगह अंतिम निर्णय में 10% अतिरिक्त टैरिफ तय किया गया है। यह फैसला अमेरिका के सेक्शन 301 (Section 301) के तहत हुई जांच के बाद लिया गया है।
क्या है ‘फोर्स्ड लेबर टैरिफ’?
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के अनुसार, यह टैरिफ उन देशों के खिलाफ लगाया गया है जिनके बारे में अमेरिका का मानना है कि वे जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात या व्यापार को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि ऐसी व्यापारिक व्यवस्था वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करती है और श्रमिक अधिकारों पर भी असर डालती है।
भारत को क्यों मिली आंशिक राहत?
जांच के शुरुआती चरण में भारत पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने का प्रस्ताव था। लेकिन भारत सरकार ने अमेरिकी पक्ष के समक्ष अपने श्रम कानूनों, संवैधानिक प्रावधानों और हाल में किए गए नीतिगत बदलावों का विस्तृत पक्ष रखा।
इसके बाद अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखते हुए 10% अतिरिक्त शुल्क लागू करने का फैसला किया। भारत सरकार का कहना है कि इस निर्णय से भारतीय निर्यातकों को अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी स्थिति मिलेगी और यह शुरुआती प्रस्ताव की तुलना में राहत देने वाला है।
किन उत्पादों पर होगा असर और किन्हें मिली छूट?
भारत सरकार के अनुसार, अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात का बड़ा हिस्सा इस अतिरिक्त शुल्क से बाहर रहेगा।
इन प्रमुख उत्पादों को फिलहाल अतिरिक्त 10% शुल्क से छूट मिली है—
- जेनेरिक दवाइयां (Generic Pharmaceuticals)
- स्मार्टफोन
- कुछ अन्य निर्दिष्ट उत्पाद
- स्टील, एल्युमिनियम और ऑटो पार्ट्स (इन पर पहले से अलग अमेरिकी प्रावधान लागू हैं)
सरकारी आकलन के अनुसार, लगभग 45% भारतीय निर्यात इस अतिरिक्त शुल्क के दायरे से बाहर रहेगा, जबकि शेष निर्यात पर नया 10% शुल्क लागू होगा।
किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है ज्यादा प्रभाव?
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि कपड़ा, परिधान, चमड़ा, कालीन, फुटवियर और कुछ श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों पर इस फैसले का असर पड़ सकता है। अमेरिकी बाजार में इन उत्पादों की लागत बढ़ने से भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है, हालांकि अंतिम प्रभाव उत्पाद और उद्योग के अनुसार अलग-अलग होगा।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता जारी
इस फैसले के बावजूद भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) पर बातचीत जारी है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अमेरिकी प्रशासन के साथ संवाद बनाए रखेगी और लंबित व्यापार समझौते को जल्द अंतिम रूप देने की दिशा में प्रयास जारी रहेंगे।
विश्लेषकों का मानना है कि नया टैरिफ दोनों देशों के बीच व्यापारिक वार्ताओं को पूरी तरह नहीं रोकेगा, लेकिन यह बातचीत का एक महत्वपूर्ण मुद्दा जरूर बनेगा।
वैश्विक स्तर पर भी उठे सवाल
अमेरिका के इस फैसले पर कई देशों ने आपत्ति जताई है। कुछ व्यापार विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि मानवाधिकारों के नाम पर लगाए गए इन शुल्कों का व्यापक आर्थिक और राजनीतिक असर भी हो सकता है। वहीं अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में श्रमिक अधिकारों की रक्षा और निष्पक्ष व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाया गया है।


