देश विदेश

रूस से तेल खरीदना भारत को पड़ेगा भारी? अमेरिका में 100% टैरिफ वाला बिल आगे बढ़ा, ट्रंप के हाथ में होगी बड़ी ताकत

वॉशिंगटन/नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनातनी एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी संसद में रूस पर प्रतिबंध कड़े करने वाला ऐसा विधेयक आगे बढ़ा है, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रस्ताव है। भारत और चीन सहित रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार इस प्रस्ताव के दायरे में आ सकते हैं।

हालांकि, यहां सबसे जरूरी बात यह है कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ अभी लगाया नहीं गया है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस-ईरान प्रतिबंधों से जुड़े विधेयक को 214-211 के मत से आगे बढ़ाया है। इसके बाद अंतिम मतदान की प्रक्रिया बाकी है। कानून बनने और उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा किसी देश पर शुल्क लगाने का फैसला अलग-अलग चरण हैं।

भारत का नाम संशोधन के जरिए सामने आया

इस विवाद की शुरुआत उस विधेयक से हुई जिसे अमेरिकी सीनेट पहले ही मंजूरी दे चुकी है। Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाना और उन देशों पर आर्थिक दबाव डालना है जो रूसी ऊर्जा की खरीद जारी रखते हैं। प्रतिनिधि सभा में पेश किए गए संशोधनों में भारत सहित रूस के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को स्पष्ट रूप से संभावित टैरिफ के दायरे में लाने का प्रस्ताव रखा गया।

भारतीय नाम वाले संशोधन के अलावा अन्य देशों का भी उल्लेख किया गया है। विभिन्न रिपोर्टों में चीन के साथ तुर्की, यूएई, सिंगापुर और कुछ अन्य देशों का जिक्र आया है। यानी यह प्रस्ताव सिर्फ भारत को निशाना बनाने वाला प्रावधान नहीं है, बल्कि रूस की ऊर्जा खरीद से जुड़े कई देशों पर दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर सामने आया है।

टैरिफ लगेगा तो किस चीज पर?

प्रस्तावित व्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि भारत से अमेरिका जाने वाले हर उत्पाद पर उसी दिन 100 प्रतिशत शुल्क लग जाएगा। विधेयक राष्ट्रपति को परिस्थितियों के आधार पर ऐसे देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रस्ताव करता है। किस देश पर, कब और किस स्तर का शुल्क लगाया जाए, यह आगे राष्ट्रपति के फैसले और कानून के लागू होने पर निर्भर करेगा।

यही वजह है कि इस समय “अमेरिका ने भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया” कहना सही नहीं होगा। फिलहाल बात उस कानूनी शक्ति की है जिसे अमेरिकी कांग्रेस राष्ट्रपति को देने पर विचार कर रही है।

अमेरिका की नाराजगी क्यों?

रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है। भारत का तर्क रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का फैसला राष्ट्रीय हित, उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय कीमतों को ध्यान में रखकर किया जाता है। हाल की भारत-रूस वार्ताओं में भी ऊर्जा सहयोग को दोनों देशों के संबंधों का अहम हिस्सा बताया गया है।

अमेरिका और उसके सहयोगियों का दृष्टिकोण अलग है। उनका लक्ष्य रूस की तेल बिक्री से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना है, क्योंकि पश्चिमी देशों के अनुसार यही आय रूस की युद्ध क्षमता को बनाए रखने में मदद करती है। अमेरिकी प्रस्ताव इसी आर्थिक दबाव को उन देशों तक बढ़ाने की कोशिश है जो रूसी ऊर्जा खरीदते हैं।

भारत के लिए मामला केवल तेल का नहीं

भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर सिर्फ कच्चे तेल की खरीद तक सीमित नहीं रह सकता। अगर अमेरिका वास्तव में भारत से आने वाले कुछ सामान पर ऊंचा शुल्क लगाता है, तो भारतीय निर्यातकों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।

भारत-अमेरिका के बीच व्यापारिक बातचीत भी चल रही है, इसलिए ऐसा कोई कदम दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए अतिरिक्त चुनौती पैदा कर सकता है। हालांकि, इस स्तर पर इसके वास्तविक असर का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी, क्योंकि अंतिम अमेरिकी कानून और उसके बाद ट्रंप प्रशासन की कार्रवाई अभी सामने नहीं आई है।

क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा?

फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा संकेत नहीं है कि भारत ने रूसी तेल खरीद बंद करने का फैसला किया है। भारत की ओर से यह रुख सामने आया है कि ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित उसके फैसलों में महत्वपूर्ण हैं। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने यह संदेश भी दिया है कि अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने की संभावना बनी हुई है।

भारत के सामने अब एक जटिल संतुलन का सवाल है—एक तरफ रूस के साथ ऊर्जा और रणनीतिक संबंध, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापार और व्यापक आर्थिक साझेदारी। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का अंतिम फैसला और उसके बाद ट्रंप प्रशासन का रुख इस पूरे मामले की दिशा तय करेगा।

अभी सबसे अहम 4 बातें

पहली: भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है।
दूसरी: अमेरिकी संसद में ऐसा कानून आगे बढ़ा है जो राष्ट्रपति को 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की शक्ति दे सकता है।
तीसरी: भारत का नाम प्रस्तावित प्रावधानों में शामिल किया गया है, लेकिन अंतिम कानूनी स्वरूप अभी तय होना बाकी है।
चौथी: इसका अगला असर भारत-अमेरिका व्यापार, निर्यात और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर पड़ सकता है।

फिलहाल इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “100 प्रतिशत टैरिफ लग गया” नहीं, बल्कि अमेरिका में भारत जैसे रूसी तेल खरीदारों पर ऐसी कार्रवाई का रास्ता तैयार किया जा रहा है। अंतिम तस्वीर अमेरिकी कांग्रेस की प्रक्रिया और राष्ट्रपति के अगले फैसलों के बाद ही साफ होगी।