राजनीति

चुनाव से विपक्ष दूर रहा तो बीजेपी सारी सीटें जीत जाएगी? दीपके की अपील पर डेरेक ओ’ब्रायन का पलटवार

नई दिल्ली: चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके की एक अपील ने राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया है। दीपके ने विपक्षी दलों से कहा कि अगर उन्हें लगता है कि चुनाव में गड़बड़ी हो रही है, तो उन्हें ऐसे चुनावों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए। उनका तर्क था कि चुनाव में भाग लेते रहने से ऐसी प्रक्रिया को वैधता मिलती है और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव होने का भ्रम बना रहता है।

दीपके की इस अपील पर तृणमूल कांग्रेस के संयुक्त सचिव और राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि विपक्ष को चुनावी मैदान छोड़ने के बजाय लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए चुनाव लड़ते रहना चाहिए और साथ ही स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की मांग को लेकर संघर्ष करना चाहिए।

दीपके ने क्यों की चुनाव बहिष्कार की अपील?

अभिजीत दीपके ने 25 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चुनावी प्रक्रिया और वोट के अधिकार को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने राजनीतिक दलों से कहा कि यदि उन्हें वास्तव में लगता है कि चुनाव में हेराफेरी हो रही है, तो केवल चुनाव लड़ना और बाद में उसी प्रक्रिया पर सवाल उठाना एक साथ नहीं चल सकता।

दीपके का कहना था कि राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि मामला केवल विपक्षी पार्टियों का नहीं, बल्कि मतदाताओं के अधिकार का है।

उनकी अपील ऐसे समय आई है जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्षी नेताओं की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों और आयोग के भीतर मतभेद की खबरों को खारिज किया है तथा कहा है कि महत्वपूर्ण फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

डेरेक ओ’ब्रायन ने क्या जवाब दिया?

डेरेक ओ’ब्रायन ने दीपके की चुनाव बहिष्कार वाली रणनीति को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि अगर विपक्ष चुनाव लड़ना ही छोड़ देता है, तो इससे भाजपा के लिए सभी सीटों पर निर्विरोध या प्रभावी रूप से बिना विपक्ष के चुनावी मैदान में रहने की स्थिति बन सकती है।

ओ’ब्रायन ने सोशल मीडिया पोस्ट में तर्क दिया कि ऐसी स्थिति में भाजपा को व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक बदलाव करने की पूरी गुंजाइश मिल सकती है। उन्होंने चुनाव से दूर रहने को जमीन पर काम कर रहे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ भी अन्याय बताया।

उनका मूल तर्क यह है कि चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने और चुनावी मैदान छोड़ने में फर्क है। विपक्षी दल चुनाव लड़ते हुए भी चुनाव सुधार, पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग उठा सकते हैं।

‘चुनाव नहीं लड़ेंगे तो बीजेपी को खुला मैदान मिल जाएगा’

डेरेक ओ’ब्रायन ने अपने जवाब में इसी संभावना को रेखांकित किया कि यदि विपक्षी दल चुनावों का बहिष्कार करते हैं, तो भाजपा सभी सीटों पर जीत हासिल कर सकती है।

उन्होंने इसे केवल विपक्षी दलों का राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा सवाल बताया। उनके मुताबिक चुनाव से पीछे हटने का असर उन कार्यकर्ताओं पर भी पड़ेगा जो चुनावी राजनीति में सक्रिय रहते हुए जमीन पर काम कर रहे हैं।

हालांकि, यह ओ’ब्रायन का राजनीतिक तर्क है; इसे भविष्य में चुनावी नतीजे के रूप में नहीं देखा जा सकता।

CJP की राजनीति और दीपके की भूमिका

अभिजीत दीपके कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के संस्थापक हैं। यह संगठन और उससे जुड़ी राजनीतिक गतिविधियां पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया और सार्वजनिक अभियानों के जरिए चर्चा में रही हैं।

इससे पहले भी तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व की ओर से CJP के प्रति समर्थन के बयान सामने आ चुके हैं। मई 2026 में डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा था कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने CJP को समर्थन दिया है।

इसी पृष्ठभूमि में दीपके और ओ’ब्रायन के बीच चुनावी रणनीति को लेकर सामने आया यह मतभेद राजनीतिक रूप से दिलचस्प माना जा रहा है।

चुनाव बहिष्कार बनाम चुनावी लड़ाई – दो अलग रणनीतियां

दीपके की रणनीति का आधार यह है कि यदि किसी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह है तो उसमें भागीदारी से उस प्रक्रिया को वैधता मिल सकती है। दूसरी ओर, ओ’ब्रायन का तर्क है कि चुनाव से हटना विपक्ष के लिए राजनीतिक और लोकतांत्रिक दोनों स्तरों पर नुकसानदेह हो सकता है।

यानी बहस केवल इस बात पर नहीं है कि चुनाव में गड़बड़ी है या नहीं। असली सवाल यह भी है कि अगर किसी राजनीतिक दल को चुनाव प्रक्रिया पर आपत्ति हो, तो वह उसका विरोध चुनावी मैदान के भीतर रहकर करे या चुनाव का बहिष्कार करके।

चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों के बीच बढ़ी बहस

यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी नेताओं की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर आरोप लगाए गए हैं।

दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने आयोग के भीतर गंभीर मतभेद की खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि महत्वपूर्ण फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। ऐसे में दीपके की चुनाव बहिष्कार की अपील और ओ’ब्रायन का जवाब चुनावी प्रक्रिया को लेकर चल रही व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा है।

अब बहस सिर्फ चुनाव लड़ने की नहीं, रणनीति की भी है

अभिजीत दीपके विपक्षी दलों से चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठने की स्थिति में चुनाव से बाहर रहने की अपील कर रहे हैं। वहीं डेरेक ओ’ब्रायन का कहना है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए चुनावी प्रक्रिया में बने रहना जरूरी है।

दोनों पक्षों के तर्क अलग हैं, लेकिन बहस का केंद्र एक ही है – चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठने की स्थिति में विपक्ष की भूमिका क्या होनी चाहिए?

आने वाले दिनों में यह मुद्दा चुनावी राजनीति के साथ-साथ चुनाव आयोग, मतदाता अधिकार और विपक्ष की रणनीति को लेकर जारी सार्वजनिक बहस में और चर्चा का विषय बन सकता है।