नई दिल्ली | ऑटोमोबाइल डेस्क
दुनियाभर में स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में तेज़ी से काम हो रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों के बाद अब हाइड्रोजन फ्यूल-सेल तकनीक को भविष्य के परिवहन का एक मजबूत विकल्प माना जा रहा है। ऑटोमोबाइल कंपनियां ऐसी कारों पर काम कर रही हैं जो हाइड्रोजन से चलें, कुछ ही मिनटों में दोबारा ईंधन भर सकें और लंबी दूरी तय करने में सक्षम हों।
हाल के दिनों में हाइड्रोजन आधारित परिवहन को लेकर चर्चा तब और तेज हुई जब भारत ने अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू की। अब हाइड्रोजन कारों को लेकर भी नई संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।
हाइड्रोजन कार आखिर होती क्या है?
हाइड्रोजन कार देखने में सामान्य कार जैसी होती है, लेकिन इसके भीतर पारंपरिक पेट्रोल या डीजल इंजन नहीं होता। इसमें फ्यूल सेल लगी होती है, जहां हाइड्रोजन और हवा में मौजूद ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली बनती है। यही बिजली इलेक्ट्रिक मोटर को चलाती है।
इस प्रक्रिया में टेलपाइप से धुआं नहीं निकलता, बल्कि केवल जलवाष्प (Water Vapour) निकलती है। इसलिए इसे शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) तकनीक माना जाता है।
1,500 किलोमीटर रेंज का दावा कितना सही?
कुछ मीडिया रिपोर्टों और ऑटोमोबाइल अनुसंधानों में भविष्य की नई पीढ़ी की हाइड्रोजन तकनीक के साथ 1,500 किलोमीटर तक की संभावित रेंज का दावा किया गया है। हालांकि यह क्षमता अभी व्यापक व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध नहीं है।
वर्तमान में बाज़ार में उपलब्ध प्रमुख हाइड्रोजन कारें—जैसे टोयोटा मिराई और हुंडई नेक्सो—एक बार टैंक भरने पर लगभग 600 से 700 किलोमीटर तक चलने में सक्षम हैं। वास्तविक दूरी वाहन, सड़क, मौसम और ड्राइविंग शैली पर निर्भर करती है।
इलेक्ट्रिक कार से कैसे अलग है?
हाइड्रोजन फ्यूल-सेल कार भी इलेक्ट्रिक मोटर से चलती है, लेकिन इसे घंटों चार्ज करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें हाइड्रोजन गैस भरी जाती है, जो सामान्यतः 3 से 5 मिनट में पूरी हो सकती है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ लंबी दूरी की यात्रा, भारी वाहन, बस, ट्रक और रेल परिवहन के लिए हाइड्रोजन तकनीक को उपयोगी विकल्प मानते हैं।
भारत में क्या है स्थिति?
भारत सरकार राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) के तहत हाइड्रोजन उत्पादन और उसके उपयोग को बढ़ावा दे रही है। इसी दिशा में भारतीय रेलवे ने हाल ही में देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईंधन उपलब्ध कराने का ढांचा विकसित होता है, तो भविष्य में हाइड्रोजन आधारित कारों का बाजार भी तेजी से बढ़ सकता है।
सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
हाइड्रोजन तकनीक जितनी आकर्षक दिखाई देती है, उसके सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं।
- हाइड्रोजन फ्यूल स्टेशन अभी बहुत कम हैं।
- ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन अभी महंगा है।
- वाहनों की शुरुआती कीमत सामान्य कारों से अधिक है।
- भंडारण और परिवहन के लिए विशेष सुरक्षा मानकों की जरूरत होती है।
इन्हीं कारणों से हाइड्रोजन कारें अभी सीमित देशों और चुनिंदा बाजारों तक ही उपलब्ध हैं।
क्या भविष्य हाइड्रोजन का होगा?
ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में बैटरी इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन—दोनों तकनीकें अपनी-अपनी जरूरतों के अनुसार साथ-साथ आगे बढ़ सकती हैं।
शहरी क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक कारें अधिक लोकप्रिय रह सकती हैं, जबकि लंबी दूरी, व्यावसायिक परिवहन और भारी वाहनों में हाइड्रोजन तकनीक की भूमिका बढ़ सकती है।
यदि उत्पादन लागत कम होती है और हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग नेटवर्क तेजी से विकसित होता है, तो भविष्य में हाइड्रोजन कारें भी आम लोगों के लिए एक व्यवहारिक विकल्प बन सकती हैं।


