जयपुर। राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य स्तर पर बढ़त बनाकर कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन नतीजों के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। जेन-जी आंदोलन के दौरान चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने BJP की जीत के बावजूद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के इलाकों के नतीजों को लेकर सत्तारूढ़ दल पर तंज कसा है।
CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुनने में आया है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री, दोनों के गृह जिले चुनाव में हाथ से निकल गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को इसी तरह नजरअंदाज करती रही तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
हालांकि चुनावी आंकड़ों की बड़ी तस्वीर BJP के पक्ष में है। यही वजह है कि CJP की टिप्पणी को BJP की चुनावी हार के रूप में देखना सही नहीं होगा। बल्कि यह बयान उन इलाकों को केंद्र में रखकर किया गया राजनीतिक हमला है, जहां BJP को अपेक्षित बढ़त नहीं मिली।
भरतपुर के नतीजे पर सबसे ज्यादा जोर
CJP के निशाने पर सबसे ज्यादा भरतपुर रहा है। भरतपुर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह जिला है और यहां के नगर निगम चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों ने BJP और कांग्रेस दोनों को पीछे छोड़ दिया।
65 वार्डों वाले भरतपुर में निर्दलीयों ने 36 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि BJP के खाते में 20 और कांग्रेस के खाते में 7 वार्ड आए। BSP और RLP को भी एक-एक वार्ड में सफलता मिली। यानी यहां किसी एक राष्ट्रीय दल का दबदबा कायम नहीं हो सका और निर्दलीय सबसे बड़े समूह के रूप में उभरे।
यही आंकड़ा CJP के लिए BJP पर निशाना साधने का प्रमुख आधार बना। स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय संगठन और वार्ड स्तर के समीकरण अक्सर बड़े राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न पर भारी पड़ते हैं। भरतपुर का परिणाम इसी लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पूरे राजस्थान में BJP की तस्वीर मजबूत
भरतपुर के नतीजे को पूरे राजस्थान का पैमाना मानना भी सही नहीं होगा। राज्य के 309 शहरी निकायों में हुए चुनाव में BJP ने कुल मिलाकर कांग्रेस से स्पष्ट बढ़त बनाई है।
ताजा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 10,200 से अधिक घोषित वार्डों में BJP ने 4,100 से ज्यादा सीटें जीती हैं, जबकि कांग्रेस करीब 3,600 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी 2,200 से ज्यादा वार्डों में जीत हासिल कर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।
बड़े शहरों की तस्वीर भी BJP के लिए राहत देने वाली रही है। उदयपुर, भीलवाड़ा और कोटा जैसे प्रमुख नगर निगमों में पार्टी ने मजबूत प्रदर्शन किया। दूसरी तरफ बीकानेर, अजमेर और पाली जैसे कुछ शहरी इलाकों में कांग्रेस ने मुकाबले को एकतरफा नहीं होने दिया। जोधपुर में BJP और कांग्रेस के बीच करीबी मुकाबला रहा, जबकि कई नगर निकायों में निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं।
शिक्षा मंत्री के इलाके में AAP की सेंध
CJP की प्रतिक्रिया का दूसरा पहलू राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के इलाके बारां से जुड़ा है। बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी ने 60 में से 31 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया है। AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस नतीजे को ‘बदलाव की हवा’ से जोड़ते हुए BJP और कांग्रेस दोनों पर निशाना साधा।
यही वजह है कि CJP प्रवक्ता ने शिक्षा और रोजगार के मुद्दे को अपनी प्रतिक्रिया में जोड़ा। CJP पिछले दिनों सरकारी स्कूलों की स्थिति और शिक्षा व्यवस्था को लेकर अभियान चलाती रही है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इस अभियान का सीधे तौर पर चुनाव परिणामों पर कितना असर पड़ा।
बारां का परिणाम जरूर यह बताता है कि कुछ स्थानीय निकायों में मतदाताओं ने BJP-कांग्रेस से अलग विकल्प को भी जगह दी है।
BJP की जीत के बावजूद निर्दलीयों की ताकत नजरअंदाज नहीं की जा सकती
राजस्थान के निकाय चुनाव की एक दिलचस्प तस्वीर यह भी है कि BJP की राज्यव्यापी बढ़त के साथ निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़ी ताकत बनकर सामने आए हैं।
कई नगर निकायों में BJP या कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। ऐसे में निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। शाहपुरा नगर परिषद इसका एक उदाहरण है, जहां कांग्रेस ने 23, BJP ने 20 और निर्दलीयों ने 12 वार्ड जीते। वहां अध्यक्ष पद के लिए निर्दलीयों का समर्थन अहम हो गया है।
यानी राजस्थान के शहरी चुनावों में एक तरफ BJP का व्यापक संगठनात्मक प्रदर्शन दिखाई देता है, तो दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर निर्दलीयों की पकड़ भी मजबूत बनी हुई है।
CJP का चुनावी असर कितना?
कॉकरोच जनता पार्टी का नाम इस साल राजस्थान की राजनीति में खास तौर पर जेन-जी आंदोलन और शिक्षा से जुड़े अभियानों के कारण चर्चा में आया। लेकिन इसे लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है—CJP ने इन निकाय चुनावों में कोई आधिकारिक चुनावी उम्मीदवार नहीं उतारा था।
इसलिए BJP की जीत या हार को सीधे CJP के समर्थन या विरोध से जोड़ना फिलहाल उचित नहीं होगा। इतना जरूर है कि CJP ने चुनाव परिणामों के बाद BJP को घेरने के लिए उन सीटों और क्षेत्रों को चुना है, जहां सत्तारूढ़ पार्टी को अपेक्षित प्रदर्शन नहीं मिला।
यही राजनीतिक संदेश CJP की प्रतिक्रिया में भी दिखाई देता है—BJP की राज्यव्यापी जीत को चुनौती देने के बजाय उसके कमजोर स्थानीय परिणामों को उजागर करना।
2028 से पहले BJP के लिए संदेश क्या?
राजस्थान के निकाय चुनाव विधानसभा चुनाव नहीं हैं, लेकिन 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले इन्हें राजनीतिक जमीन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा जरूर माना जा रहा है। BJP के लिए सबसे बड़ा सकारात्मक संकेत यह है कि पार्टी ने राज्य के शहरी निकायों में कांग्रेस से बड़ी बढ़त बनाई है।
वहीं, भरतपुर जैसे परिणाम BJP को यह याद दिलाते हैं कि मुख्यमंत्री का गृह जिला होना अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है। स्थानीय उम्मीदवार, संगठन, टिकट वितरण और वार्ड स्तर की नाराजगी जैसे मुद्दे नगर निकाय चुनाव में अलग समीकरण बना सकते हैं।
CJP की प्रतिक्रिया इसी राजनीतिक खाली जगह को पकड़ने की कोशिश के तौर पर देखी जा सकती है। लेकिन इस समय उपलब्ध चुनावी आंकड़े यह साफ करते हैं कि राजस्थान के निकाय चुनाव में बढ़त BJP की है, जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों ने कई जगह मुकाबले का गणित जरूर बदल दिया है।
अब नजर उन नगर निकायों पर है जहां बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन निर्णायक होगा। आने वाले दिनों में यही तय करेगा कि चुनावी जीत को स्थानीय सत्ता में बदलने की असली बाजी कौन जीतता है।


