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रघुराम राजन के सवालों के बीच IMF ने भारत की नई GDP गणना को सराहा, 7.8% ग्रोथ पर भी लगाई मुहर

नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार और GDP के नए आंकड़ों को लेकर चल रही बहस के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF की टिप्पणी सरकार के लिए राहत देने वाली है। IMF ने भारत के सांख्यिकीय ढांचे को आधुनिक बनाने की कोशिशों का स्वागत किया है और कहा है कि नई औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) तथा उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) सीरीज GDP के अनुमानों की सटीकता को बेहतर बनाने में मदद करेंगी।

यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत की पहली तिमाही की 7.8 प्रतिशत वास्तविक GDP वृद्धि को लेकर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन समेत कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों और जमीन पर दिखाई देने वाली आर्थिक गतिविधियों के बीच अंतर को लेकर सवाल उठाए हैं। ऐसे में IMF की टिप्पणी ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है।

IMF ने वास्तव में क्या कहा?

IMF की संचार विभाग की निदेशक जूली कोजैक ने कहा कि भारत की हालिया GDP रिलीज में नई IIP और PPI सीरीज को शामिल किया गया है और इन दोनों से GDP अनुमानों की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद है। IMF ने भारत के सांख्यिकीय ढांचे को आधुनिक बनाने के प्रयासों का भी स्वागत किया है।

IMF की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि GDP के आंकड़े केवल सरकार की आर्थिक उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड नहीं होते। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर निवेश, मौद्रिक नीति, सरकारी योजनाओं और अर्थव्यवस्था की दिशा को लेकर बड़े फैसले लिए जाते हैं। इसलिए GDP की गणना में इस्तेमाल होने वाला डेटा और तरीका जितना मजबूत होगा, आंकड़ों पर भरोसा भी उतना ही बढ़ेगा।

7.8% की GDP ग्रोथ ने चौंकाया

अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। यह बाजार के कई अनुमानों से बेहतर रही। IMF ने भी इस प्रदर्शन को उम्मीद से बेहतर बताया है। उसके मुताबिक मजबूत सेवा क्षेत्र और निर्यात ने इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह आंकड़ा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था ऊर्जा कीमतों के झटके और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपेक्षाकृत मजबूती दिखाई है। IMF ने भारत की इस आर्थिक लचीलापन यानी resilience को भी रेखांकित किया है।

GDP की नई गणना में आखिर बदला क्या है?

भारत ने 2026 में GDP की नई सीरीज जारी की है, जिसमें 2022-23 को नया आधार वर्ष बनाया गया है। इससे पहले GDP की गणना के लिए 2011-12 आधार वर्ष था। सरकार के मुताबिक आधार वर्ष को अपडेट करने का मकसद अर्थव्यवस्था की मौजूदा संरचना को आंकड़ों में बेहतर ढंग से शामिल करना है।

नई सीरीज में कई अहम बदलाव किए गए हैं। इनमें नए डेटा स्रोतों का इस्तेमाल, कीमतों को मापने के लिए बेहतर संकेतकों का उपयोग और विनिर्माण क्षेत्र में डबल डिफ्लेशन जैसी पद्धति शामिल है। सरकार का कहना है कि इससे वास्तविक आर्थिक गतिविधि को मापने की क्षमता बेहतर होगी।

सरल भाषा में समझें तो GDP का वास्तविक आंकड़ा निकालते समय सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किसी वस्तु या सेवा की कीमत कितनी बढ़ी। यह भी देखना पड़ता है कि वास्तव में उत्पादन कितना बढ़ा। नई व्यवस्था इसी प्रक्रिया को ज्यादा सटीक बनाने की कोशिश करती है।

रघुराम राजन ने क्या सवाल उठाए थे?

GDP के मजबूत आंकड़ों के बावजूद आर्थिक वृद्धि की गुणवत्ता और आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। रघुराम राजन ने हालिया चर्चा में इस बात पर सवाल किया कि अगर अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है, तो निजी निवेश, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियों में उसी अनुपात में तेजी क्यों नहीं दिखाई दे रही।

यहां यह समझना जरूरी है कि GDP के आंकड़ों पर सवाल उठाना और नई GDP पद्धति को गलत साबित करना दो अलग बातें हैं। राजन का तर्क आर्थिक वृद्धि की व्यापक तस्वीर और उसके जमीनी प्रभावों से जुड़ा रहा है, जबकि सरकार और सांख्यिकी अधिकारियों का कहना है कि नई सीरीज बेहतर डेटा और नई पद्धति पर आधारित है।

इसी वजह से इस पूरे विवाद को “राजन बनाम सरकार” तक सीमित करना अर्थव्यवस्था की जटिल तस्वीर को छोटा कर देता है।

IMF की मौजूदा टिप्पणी से क्या बदला?

IMF की ताजा टिप्पणी से इतना जरूर स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय संस्था भारत द्वारा किए गए सांख्यिकीय सुधारों को सकारात्मक कदम मान रही है। खास तौर पर नए IIP और PPI को GDP अनुमान में शामिल करने को IMF ने उपयोगी बताया है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि IMF ने GDP के हर आंकड़े या भारत की आर्थिक नीति को बिना किसी सवाल के प्रमाणित कर दिया है। IMF की अपनी पिछली रिपोर्टों में भारत के राष्ट्रीय खातों में आधार वर्ष, वॉल्यूम अनुमान और उत्पादन तथा व्यय आधारित GDP के बीच अंतर जैसी पद्धतिगत चुनौतियों का उल्लेख किया गया था।

यानी तस्वीर को सही तरीके से समझने के लिए दोनों पक्षों को साथ देखना होगा—भारत ने सांख्यिकीय ढांचे में सुधार किया है और IMF इन सुधारों का स्वागत कर रहा है, लेकिन GDP के आंकड़ों की पारदर्शिता और आर्थिक वृद्धि की गुणवत्ता पर बहस खत्म नहीं हुई है।

सरकार ने भी आंकड़ों पर उठ रहे सवालों का दिया जवाब

नई GDP सीरीज को लेकर सवाल उठने के बाद सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने आंकड़ों और नई पद्धति को समझाने के लिए विस्तृत FAQ जारी किए हैं। सरकार का कहना है कि नए आंकड़े संशोधित डेटा स्रोतों और बेहतर पद्धति के कारण अलग दिखाई दे सकते हैं और इसे आंकड़ों में हेरफेर के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

सांख्यिकी सचिव सौरभ गर्ग ने भी कहा है कि संशोधनों की वजह नई पद्धति और अपडेटेड डेटा स्रोत हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बदलाव किसी पूर्व निर्धारित दिशा में आंकड़े बढ़ाने के लिए नहीं किए गए हैं।

असली सवाल अब आगे की पारदर्शिता का

भारत के लिए IMF की सकारात्मक टिप्पणी निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन GDP पर भरोसा केवल एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की तारीफ से कायम नहीं होगा। लंबे समय में आंकड़ों की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि नई पद्धति कितनी पारदर्शी है, नए डेटा स्रोत कितने मजबूत हैं और आने वाले वर्षों में अनुमानों के संशोधन कितने स्थिर रहते हैं।

नई GDP सीरीज का उद्देश्य भी यही है कि बदलती भारतीय अर्थव्यवस्था—बढ़ते सेवा क्षेत्र, औपचारिक होती गतिविधियों, डिजिटल कारोबार और बदलते उत्पादन ढांचे—को पुराने आधार वर्ष की तुलना में बेहतर तरीके से मापा जा सके। IMF की हालिया टिप्पणी इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत जरूर है।

इसलिए फिलहाल तस्वीर को इस तरह समझना ज्यादा उचित होगा: रघुराम राजन और दूसरे अर्थशास्त्रियों के सवालों से GDP के आंकड़ों पर बहस जरूर जारी है, लेकिन IMF ने भारत की नई सांख्यिकीय व्यवस्था के प्रमुख सुधारों का समर्थन किया है। अब सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह इसी भरोसे को अधिक पारदर्शी और विस्तृत डेटा के जरिए मजबूत करे।