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भारत की चीनी महंगी हुई तो दुनिया भी क्यों हिली? ब्राजील की एथेनॉल नीति और मौसम ने बढ़ाई ग्लोबल टेंशन

नई दिल्ली। चाय की प्याली से लेकर मिठाई की दुकान तक—चीनी की बढ़ती कीमत अब सिर्फ भारत की घरेलू परेशानी नहीं रह गई है। दुनिया के कई बड़े चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों में उत्पादन और आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ रही है। भारत में जहां चीनी के दाम पिछले कुछ हफ्तों में तेजी से बढ़े हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। इसके पीछे कमजोर उत्पादन, मौसम की मार और ब्राजील में गन्ने के इस्तेमाल का एथेनॉल की ओर बढ़ता झुकाव अहम कारणों में शामिल हैं। 

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उपभोक्ताओं में है, जबकि ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक और प्रमुख चीनी निर्यातक है। ऐसे में ब्राजील की फसल या नीति में बदलाव का असर सीधे वैश्विक आपूर्ति पर पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक ब्राजील दुनिया के करीब 24% गन्ने का उत्पादन करता है, जबकि भारत की हिस्सेदारी करीब 16% है। 

भारत में चीनी के दाम क्यों बढ़े?

भारत में चीनी की कीमतों में तेजी का एक बड़ा कारण इस साल घरेलू उत्पादन का अनुमान से कम रहना है। सरकार के ताजा अनुमान के मुताबिक मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन करीब 306 लाख टन रहने की उम्मीद है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों का शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन था। यानी उत्पादन अनुमान में लगभग 11 फीसदी की कमी आई है। 

सरकार ने इसके लिए गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर बीमारी तथा जरूरत से ज्यादा बारिश के कारण हुए जलभराव को प्रमुख वजहों में गिनाया है। इससे महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में फसल प्रभावित हुई। 

दूसरी तरफ अगस्त से नवंबर के बीच भारत में त्योहारों का मौसम होता है। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान मिठाइयों और कन्फेक्शनरी की मांग बढ़ती है। ऐसे समय में उपलब्धता पर थोड़ा दबाव भी कीमतों को तेजी से ऊपर ले जा सकता है। 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 जुलाई को चीनी की औसत कीमत करीब ₹48.18 प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई। 

क्या एथेनॉल के लिए गन्ना जाने से चीनी महंगी हुई? सरकार ने दिया अलग जवाब

चीनी की महंगाई के बीच एथेनॉल नीति भी राजनीतिक और आर्थिक बहस के केंद्र में है। आरोप लगाया जा रहा है कि गन्ने का ज्यादा हिस्सा एथेनॉल बनाने में जाने से चीनी का उत्पादन प्रभावित हुआ है।

हालांकि केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज किया है। सरकार के मुताबिक एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्ट करने की हिस्सेदारी 2022-23 के करीब 12 फीसदी से घटकर 2025-26 में करीब 9 फीसदी रह गई है। सरकार का कहना है कि मौजूदा कीमत वृद्धि को केवल एथेनॉल से जोड़ना सही नहीं होगा। 

सरकार के अनुसार इस बार कीमतों में तेजी के पीछे कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं—कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, मौसम से फसल को नुकसान, वैश्विक आपूर्ति में कमी और बाजार में सट्टेबाजी या जमाखोरी की आशंका। 

अब नजर ब्राजील पर, क्योंकि वहां का फैसला दुनिया को प्रभावित कर सकता है

वैश्विक चीनी बाजार में सबसे बड़ा सवाल अब ब्राजील को लेकर है। ब्राजील न केवल गन्ने का सबसे बड़ा उत्पादक है बल्कि दुनिया के सबसे बड़े चीनी निर्यातकों में भी शामिल है।

ब्राजील में गन्ने का इस्तेमाल चीनी के साथ-साथ एथेनॉल बनाने में भी होता है। जब कच्चे तेल की कीमतें ऊंची होती हैं, तो एथेनॉल की मांग बढ़ने से गन्ने को चीनी उत्पादन की बजाय ईंधन बनाने में इस्तेमाल करने का आर्थिक प्रोत्साहन बढ़ जाता है। 

इसका सीधा असर यह हो सकता है कि वैश्विक बाजार के लिए उपलब्ध चीनी की मात्रा कम हो जाए। रिपोर्टों के मुताबिक ब्राजील ने जुलाई के अंत में अनिवार्य एथेनॉल मिश्रण की दर को 32 फीसदी कर दिया, जो इससे पहले 30 फीसदी और एक साल पहले 27 फीसदी थी। 

यानी ब्राजील में गन्ने का बड़ा हिस्सा अगर ईंधन की तरफ जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।

मौसम भी बिगाड़ रहा है पूरा गणित

चीनी बाजार के लिए दूसरी बड़ी चुनौती मौसम है। इस समय मजबूत होते El Niño को लेकर कृषि बाजारों में चिंता बढ़ी हुई है।

El Niño के कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान का सामान्य पैटर्न बदल सकता है। इसका असर गन्ने जैसी पानी पर निर्भर फसल पर भी पड़ता है। भारत और थाईलैंड जैसे प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में कम बारिश और ब्राजील के कुछ हिस्सों में गर्मी या बारिश के पैटर्न में बदलाव उत्पादन के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। 

यही वजह है कि वैश्विक बाजार में चीनी की आपूर्ति को लेकर अनुमान लगातार बदल रहे हैं।

दुनिया में चीनी की कमी का अनुमान

भारत सरकार ने भी माना है कि चीनी की आपूर्ति का दबाव केवल घरेलू समस्या नहीं है। उसके अनुसार 2026-27 में वैश्विक चीनी घाटा करीब 33 लाख टन रहने का अनुमान है।

इसी अवधि में अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमत में भी उल्लेखनीय तेजी दर्ज हुई है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय कीमत 30 जून के करीब 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को करीब 552 डॉलर प्रति टन हो गई—यानी दो महीने से भी कम समय में 16 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी। 

यह बताता है कि भारत में दिखाई दे रही महंगाई पूरी तरह अलग-थलग घटना नहीं है।

10 साल बाद भारत को क्यों करना पड़ा चीनी आयात का फैसला?

चीनी उत्पादन में कमी और बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह कदम करीब एक दशक बाद उठाया गया है।

सरकार ने यह फैसला त्योहारों के मौसम से पहले घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए किया है। आयात की अनुमति 31 अक्टूबर तक है। रिपोर्टों के मुताबिक ब्राजील से आने वाली खेप को भारत पहुंचने में करीब दो महीने लग सकते हैं, इसलिए इसका बड़ा असर अक्टूबर के आसपास दिखाई देने की संभावना है। 

इस कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी हलचल हुई और लंदन तथा न्यूयॉर्क में चीनी वायदा कीमतों में करीब 4 फीसदी तक की तेजी देखी गई। 

सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए भी कसी कमर

सिर्फ आयात पर निर्भर रहने के बजाय सरकार ने घरेलू बाजार में स्टॉक की निगरानी भी कड़ी की है।

1 सितंबर से 30 नवंबर तक ऐसे थोक उपभोक्ता जो महीने में 10 टन से अधिक चीनी इस्तेमाल करते हैं, वे अपने पास 15 दिन से ज्यादा का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। इससे पहले डीलरों के लिए भी स्टॉक रखने की सीमा तय की गई थी।

सरकार का मकसद साफ है—त्योहारों के दौरान कृत्रिम कमी पैदा न हो और उपलब्ध स्टॉक बाजार में आता रहे।

तो क्या आने वाले दिनों में चीनी और महंगी होगी?

इसका सीधा जवाब अभी देना मुश्किल है। एक तरफ घरेलू उत्पादन कम है और त्योहारों के कारण मांग बढ़ने वाली है। दूसरी तरफ सरकार ने आयात खोल दिया है, स्टॉक लिमिट लागू की है और बाजार पर निगरानी बढ़ाई है।

अगर आयातित चीनी समय पर बाजार में आती है और घरेलू आपूर्ति सुधरती है तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन यदि ब्राजील समेत प्रमुख उत्पादक देशों में मौसम या एथेनॉल नीति के कारण उपलब्धता और घटती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार की तेजी भारत के लिए भी चुनौती बनी रह सकती है।

असल कहानी सिर्फ चीनी की कीमत की नहीं है

इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ “एथेनॉल बनाम चीनी” के विवाद के रूप में देखना अधूरा होगा। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि बाजार पर कई दबाव एक साथ हैं—भारत में कम उत्पादन और त्योहारों की मांग, ब्राजील में चीनी और एथेनॉल के बीच गन्ने के इस्तेमाल का बदलता गणित और दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का बढ़ता जोखिम।

यही वजह है कि जिस चीनी की कीमत घर की रसोई में कुछ रुपये बढ़ती दिखाई देती है, उसके पीछे अब किसान, मौसम, एथेनॉल, अंतरराष्ट्रीय बाजार और सरकारी नीति—सबकी कहानी जुड़ गई है।