राजनीति

बांकीपुर में तेजस्वी का ‘वॉकओवर’ या नई चुनावी चाल? प्रशांत किशोर की एंट्री से बीजेपी की बढ़ी सियासी चुनौती

पटना | विशेष रिपोर्ट

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव अब केवल एक सीट का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य की बदलती राजनीतिक रणनीतियों का बड़ा संकेत माना जा रहा है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की ओर से चुनावी रणनीति को लेकर उठे सवालों और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की सक्रियता ने इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि आरजेडी पूरी ताकत से मुकाबले में नहीं उतरती या उसका अभियान अपेक्षाकृत कमजोर रहता है, तो इसका सीधा असर मुकाबले की दिशा पर पड़ सकता है। इसी बीच प्रशांत किशोर लगातार दावा कर रहे हैं कि बांकीपुर में भारतीय जनता पार्टी पहले जैसी सहज स्थिति में नहीं है।

बांकीपुर क्यों बना राजनीतिक केंद्र?

पटना शहर की सबसे चर्चित विधानसभा सीटों में शामिल बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग हैं। भाजपा के उम्मीदवार बदलने, जन सुराज की आक्रामक चुनावी रणनीति और विपक्ष की बदली हुई भूमिका ने चुनाव को त्रिकोणीय चर्चा का विषय बना दिया है।

प्रशांत किशोर का सीधा हमला

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार के दौरान दावा किया कि भाजपा पहली बार बांकीपुर में दबाव महसूस कर रही है। उनका कहना है कि उम्मीदवार बदलने की नौबत आना इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर भी चुनाव को लेकर चिंता है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी सीट को किसी दल की स्थायी जागीर नहीं माना जा सकता और मतदाता बदलाव का फैसला कर सकते हैं।

तेजस्वी यादव की रणनीति पर चर्चा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर में आरजेडी की रणनीति भी इस चुनाव का अहम पहलू है। कुछ विश्लेषकों का आकलन है कि यदि महागठबंधन पूरी ताकत से चुनाव नहीं लड़ता, तो विपक्षी वोटों का समीकरण बदल सकता है। वहीं दूसरी राय यह है कि विपक्ष का सीमित हस्तक्षेप प्रशांत किशोर को अधिक राजनीतिक स्पेस दे सकता है। हालांकि आरजेडी की ओर से इसे लेकर कोई आधिकारिक स्वीकारोक्ति नहीं की गई है।

बीजेपी का भरोसा कायम

भाजपा नेताओं का कहना है कि बांकीपुर में संगठन, कार्यकर्ता नेटवर्क और पिछले चुनावों का प्रदर्शन पार्टी की सबसे बड़ी ताकत है। पार्टी का दावा है कि उम्मीदवार परिवर्तन के बावजूद चुनावी मशीनरी पूरी मजबूती के साथ मैदान में है और मतदाताओं का भरोसा भाजपा के साथ बना हुआ है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व ने भी एकजुटता का संदेश देने के लिए लगातार बैठकें और संयुक्त प्रचार अभियान चलाए हैं।

क्या होगा वोटों का गणित?

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार इस उपचुनाव का सबसे बड़ा सवाल विपक्षी वोटों का बंटवारा है। यदि जन सुराज और महागठबंधन दोनों अलग-अलग प्रभावी प्रदर्शन करते हैं, तो इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। वहीं यदि भाजपा विरोधी मतों का ध्रुवीकरण होता है, तो मुकाबला अपेक्षा से अधिक कड़ा हो सकता है। यही कारण है कि बांकीपुर उपचुनाव को बिहार की आगामी राजनीति की दिशा तय करने वाले संकेतक के रूप में देखा जा रहा है।