नई दिल्ली | विशेष संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सप्ताह इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के दौरे पर हैं। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक एवं आर्थिक धुरी बनता जा रहा है। विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि यह दौरा केवल औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा की शुरुआत इंडोनेशिया से की, जहां दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का प्रमुख साझेदार माना जाता है। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है और हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक सहयोग भी नई ऊंचाइयों तक पहुंच रहा है।
इसके बाद प्रधानमंत्री ऑस्ट्रेलिया पहुंचे, जहां उनका भव्य स्वागत किया गया। ऑस्ट्रेलिया वर्तमान समय में भारत का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार बनकर उभरा है। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, तकनीकी नवाचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को लेकर व्यापक चर्चा होने की संभावना है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के उन देशों में शामिल है जिनके पास लिथियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों का बड़ा भंडार है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और नई ऊर्जा तकनीकों के लिए आवश्यक हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ता सहयोग चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। दोनों देश पहले से ही क्वाड (QUAD) समूह के सदस्य हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा तथा मुक्त समुद्री मार्गों के समर्थन में एक साथ काम कर रहे हैं।
यात्रा के तीसरे चरण में प्रधानमंत्री न्यूज़ीलैंड जाएंगे। वहां व्यापार, कृषि, शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग न्यूज़ीलैंड में रहते हैं, जिसके कारण दोनों देशों के संबंध केवल सरकारी स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी मजबूत हैं।
भारत को क्या होगा फायदा?
इस यात्रा से भारत को कई स्तरों पर लाभ मिलने की उम्मीद है—
* हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रभाव मजबूत होगा।
* रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई गति मिलेगी।
* महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी।
* व्यापार और निवेश के नए अवसर खुलेंगे।
* भारतीय कंपनियों के लिए विदेशी बाजारों तक पहुंच बढ़ेगी।
* भारतीय प्रवासी समुदाय के साथ संबंध और मजबूत होंगे।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
वर्तमान समय में अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत एक स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति के माध्यम से अपने हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारत की दीर्घकालिक वैश्विक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
निष्कर्ष
विश्लेषकों का मानना है कि इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की यह यात्रा भारत की कूटनीतिक सक्रियता, आर्थिक महत्वाकांक्षा और वैश्विक नेतृत्व क्षमता को प्रदर्शित करती है। यदि इस दौरे के दौरान प्रस्तावित समझौते और साझेदारियां जमीन पर उतरती हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत को रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी स्तर पर महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं।


