नई दिल्ली: दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने देश की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था दोनों में नई बहस छेड़ दी। अदालत ने सुनवाई के दौरान इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि कुछ मामलों में आरोपियों को जमानत मिल जाती है, जबकि कुछ आरोपी वर्षों से जेल में बंद हैं और उनका ट्रायल अब तक पूरा नहीं हो पाया है।
दरअसल, अदालत के सामने यह तर्क रखा गया कि कश्मीर के एक कथित नार्को-टेरर मामले में आरोपी को जमानत मिल चुकी है, लेकिन दिल्ली दंगों के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपी लंबे समय से जेल में हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “बेल नियम है और जेल अपवाद”, और हर मामले में समान कानूनी सिद्धांत लागू होने चाहिए।
कोर्ट ने साफ किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में गंभीरता जरूरी है, लेकिन किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना भी न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ माना जा सकता है। यही वजह है कि अदालत अब ट्रायल की गति और आरोपों की प्रकृति दोनों को साथ देखकर फैसला करना चाहती है।
राजनीतिक रूप से यह मामला बेहद संवेदनशील बन चुका है। विपक्ष इसे “चयनात्मक न्याय” और “राजनीतिक विचारधारा के आधार पर कार्रवाई” बता रहा है। वहीं केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों का कहना है कि दिल्ली दंगे देश की राजधानी की सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द पर हमला थे, इसलिए मामले को सामान्य अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी आने वाले समय में यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के इस्तेमाल पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है। अगर अदालत ट्रायल में देरी को जमानत का आधार मानती है, तो कई हाई-प्रोफाइल मामलों में नए कानूनी रास्ते खुल सकते हैं।


