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BRICS में चीन की बड़ी चाल? जिनपिंग ने रखीं 5 पहलें, बाजार से AI तक भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है चुनौती

नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में हुए BRICS शिखर सम्मेलन में एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक सहयोग, तकनीक और सप्लाई चेन को किसी एक देश के दबदबे से मुक्त रखने की जरूरत पर जोर दिया, तो दूसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने BRICS के अगले दौर के लिए अपना आर्थिक और तकनीकी एजेंडा सामने रख दिया। जिनपिंग ने पांच बड़ी पहलों का प्रस्ताव रखा, जिनका फोकस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, व्यापार एवं निवेश, डिजिटल उद्योग, स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी प्रतिभा तैयार करने पर है।

चीन को 2027 में BRICS की अध्यक्षता करनी है और अगला शिखर सम्मेलन भी उसकी मेजबानी में होगा। ऐसे में जिनपिंग की ओर से रखी गई ये पहलें महज एक भाषण का हिस्सा नहीं रह जातीं। इनमें से कुछ मुद्दे अगले साल BRICS के एजेंडे में जगह बना सकते हैं। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी प्रस्तावों पर सदस्य देशों की सहमति बन गई है। नई दिल्ली घोषणा में BRICS ने सहयोग के व्यापक सिद्धांतों और AI समेत कई क्षेत्रों में सहयोग की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन जिनपिंग की पांचों पहलों को सामूहिक रूप से स्वीकार किए जाने की घोषणा नहीं हुई है।

पहली पहल: BRICS का अपना AI इकोसिस्टम

जिनपिंग ने सबसे ज्यादा जोर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर दिया। चीन ने BRICS AI ओपन-सोर्स कम्युनिटी बनाने की पहल की है। इसके तहत बड़े लैंग्वेज मॉडल यानी LLM के विकास और इस्तेमाल में सहयोग, AI प्रशिक्षण कार्यक्रम और सेमिनार तथा एक खुले AI इकोसिस्टम की दिशा में काम करने का प्रस्ताव है।

यहीं से भारत के लिए सबसे दिलचस्प सवाल पैदा होता है। AI अब सिर्फ टेक्नोलॉजी का विषय नहीं रह गया है। डेटा, कंप्यूटिंग क्षमता, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, चिप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म आने वाले वर्षों की आर्थिक और रणनीतिक ताकत का हिस्सा हैं। ऐसे में यदि BRICS के भीतर किसी साझा AI प्लेटफॉर्म या डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का ढांचा बनता है, तो उसकी तकनीकी संरचना, डेटा गवर्नेंस और सुरक्षा मानकों को लेकर भारत स्वाभाविक रूप से सतर्क रहेगा।

हालांकि भारत के लिए इसमें अवसर भी कम नहीं हैं। भारतीय IT और AI प्रतिभा इस तरह के सहयोग में बड़ी भूमिका निभा सकती है। नई दिल्ली घोषणा में भी AI की सुरक्षा, विश्वसनीयता, समावेशिता और विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को महत्वपूर्ण बताया गया है। इसलिए इस पहल को केवल “चीनी खतरे” के नजरिए से देखना तस्वीर को अधूरा कर देगा। असली सवाल यह होगा कि साझा AI व्यवस्था के नियम कौन तय करता है और उसमें भारत की भूमिका कितनी प्रभावी रहती है।

दूसरी पहल: BRICS का बड़ा इंटीग्रेटेड मार्केट

जिनपिंग ने BRICS देशों के बीच व्यापार और निवेश को आसान बनाने के लिए एक बड़े और ज्यादा एकीकृत बाजार की दिशा में आगे बढ़ने का प्रस्ताव रखा। इसके तहत चीन ने BRICS स्पेशल इकोनॉमिक जोन पार्टनरशिप और एक तरह के स्मार्ट पोर्टल की बात की है, जिससे नीतियों के बीच तालमेल और कारोबार को आसान बनाया जा सके। चीन अगले साल BRICS Forum on Trade in Services आयोजित करने का भी प्रस्ताव दे रहा है।

सुनने में यह विचार व्यापार बढ़ाने के लिहाज से आकर्षक है, लेकिन भारत के लिए इसके साथ एक बड़ा सवाल जुड़ा है—चीनी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार कितना खुलेगा?

भारत और चीन के बीच व्यापार पहले से ही असंतुलित है। प्रधानमंत्री मोदी और जिनपिंग की हालिया बैठक में भी दोनों देशों ने संरचनात्मक व्यापार असंतुलन, सप्लाई चेन और बाजार तक बेहतर एवं पूर्वानुमान योग्य पहुंच जैसे मुद्दों पर चर्चा की।

ऐसे में यदि BRICS के भीतर बाजारों को ज्यादा तेजी से एकीकृत करने की कोशिश होती है, तो भारत यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि व्यापार खुलने का लाभ दोनों तरफ समान रूप से मिले। भारतीय उद्योग के लिए चिंता यह हो सकती है कि कम लागत वाले चीनी उत्पादों और कंपनियों की प्रतिस्पर्धा घरेलू विनिर्माण पर दबाव न बढ़ा दे।

तीसरी पहल: डिजिटल इंडस्ट्री का साझा प्लेटफॉर्म

जिनपिंग की तीसरी पहल डिजिटल उद्योग को लेकर है। चीन ने BRICS Digital Ecosystem Cloud Platform बनाने, डिजिटल स्किल ट्रेनिंग, तकनीकी आदान-प्रदान और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। लक्ष्य डिजिटल अर्थव्यवस्था में सदस्य देशों के बीच सहयोग को मजबूत करना है।

भारत के लिए यह क्षेत्र अवसर और जोखिम, दोनों लेकर आता है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, पेमेंट सिस्टम और डिजिटल सेवाओं में भारत ने अपनी अलग पहचान बनाई है। दूसरी ओर चीन हार्डवेयर, टेलीकॉम उपकरण और डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग में बड़ी क्षमता रखता है। इसलिए दोनों देशों के बीच सहयोग से फायदा हो सकता है, लेकिन भारत संभवतः डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा से जुड़े सुरक्षा पहलुओं पर नियंत्रण छोड़ने के पक्ष में नहीं होगा।

चौथी पहल: स्मार्ट फैक्ट्री और मैन्युफैक्चरिंग

चीन ने BRICS देशों को स्मार्ट फैक्ट्री विकसित करने और मैन्युफैक्चरिंग को आधुनिक बनाने में सहयोग देने की बात कही है। इसका मतलब उत्पादन में ऑटोमेशन, डिजिटल तकनीक और आधुनिक औद्योगिक प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ाना है।

भारत के लिए यह पहल सीधे उसके “मेक इन इंडिया” और मैन्युफैक्चरिंग विस्तार के एजेंडे से जुड़ती है। यदि चीन की तकनीक, मशीनरी और औद्योगिक विशेषज्ञता का इस्तेमाल होता है तो भारतीय कंपनियों को कुछ क्षेत्रों में लागत और तकनीकी लाभ मिल सकता है। लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में अत्यधिक चीनी निर्भरता को लेकर नई दिल्ली की पुरानी चिंताएं भी बनी रहेंगी।

यानी चुनौती यह नहीं कि भारत स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग से दूरी बनाए, बल्कि यह तय करना है कि तकनीकी सहयोग किस सीमा तक और किन सुरक्षा शर्तों के साथ हो।

पांचवीं पहल: इंजीनियर और तकनीकी प्रतिभा तैयार करने का प्रस्ताव

जिनपिंग ने BRICS Engineer Cultivation Alliance बनाने का प्रस्ताव भी रखा है। इसके जरिए इंजीनियरिंग प्रतिभा को विकसित करने, कौशल के मानकों को बेहतर बनाने और देशों के बीच तकनीकी प्रतिभा के आदान-प्रदान की बात की गई है। इसके साथ युवा वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहयोग को बढ़ाने की पहल भी प्रस्तावित है।

भारत जैसे युवा और विशाल तकनीकी कार्यबल वाले देश के लिए यह पहल अपने आप में उपयोगी हो सकती है। लेकिन यहां भी सवाल यही रहेगा कि ऐसे सहयोग का ढांचा कितना खुला और संतुलित होगा। भारत नहीं चाहेगा कि तकनीकी सहयोग के नाम पर किसी एक देश की तकनीकी प्रणालियां या मानक पूरे समूह में प्रभावी हो जाएं।

जिनपिंग का असली फोकस क्या है?

इन पांच प्रस्तावों को एक साथ देखें तो एक पैटर्न दिखाई देता है। चीन BRICS को केवल राजनीतिक मंच के रूप में नहीं, बल्कि व्यापार, तकनीक, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, विनिर्माण और मानव संसाधन के बड़े सहयोगी नेटवर्क के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है।

यह चीन के व्यापक Global South outreach से भी जुड़ता है। जिनपिंग ने BRICS देशों से उभरती अर्थव्यवस्थाओं और Global South के साथ संबंध मजबूत करने, सप्लाई चेन को स्थिर रखने और एक बड़े एकीकृत बाजार की दिशा में काम करने की अपील की।

इसका मतलब यह नहीं है कि चीन BRICS पर अकेले अपनी शर्तें थोप सकता है। BRICS का विस्तार अब समूह को कहीं ज्यादा विविध बनाता है। भारत, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका के अलावा नए सदस्य देशों और साझेदार देशों के अपने-अपने आर्थिक और रणनीतिक हित हैं। इसलिए किसी भी बड़े प्रस्ताव पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा।

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल: सहयोग या निर्भरता?

भारत की चुनौती चीन के हर प्रस्ताव को खारिज करना नहीं है। बल्कि चुनौती यह है कि जहां दोनों देशों के हित मिलते हैं, वहां सहयोग किया जाए और जहां राष्ट्रीय सुरक्षा या घरेलू उद्योग प्रभावित होने की आशंका हो, वहां सुरक्षा कवच बनाए रखा जाए।

प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की हालिया द्विपक्षीय बैठक में भी दोनों देशों ने संबंधों को दीर्घकालिक नजरिए से आगे बढ़ाने की बात कही, लेकिन भारत ने साफ तौर पर सीमा क्षेत्रों में शांति को रिश्तों के विकास की जरूरी बुनियाद बताया। दोनों नेताओं ने व्यापार असंतुलन और सप्लाई चेन से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की।

इसीलिए BRICS में चीन का नया एजेंडा भारत के लिए न तो केवल खतरा है और न ही सिर्फ अवसर। यह दोनों का मिश्रण है। AI, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग में सहयोग भारत को नई तकनीक और बड़े बाजार दे सकता है, लेकिन अगर सहयोग की शर्तें चीन की तकनीकी या औद्योगिक बढ़त को BRICS के भीतर स्थायी प्रभाव में बदलने लगें, तो नई दिल्ली के लिए यह रणनीतिक चुनौती बन सकती है।

अब नजर 2027 के चीन वाले BRICS पर

भारत की अध्यक्षता में हुए 2026 के BRICS सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणा पर सदस्य देशों की सहमति बनी और अध्यक्षता अब चीन के पास जाएगी। ऐसे में असली परीक्षा अगले साल होगी—क्या जिनपिंग की पांच पहलों में से कुछ BRICS की सामूहिक नीतियों का हिस्सा बनती हैं, या सदस्य देश इन्हें अपने-अपने हितों के हिसाब से सीमित रखते हैं।

भारत के लिए शायद सबसे अहम बात यही होगी कि BRICS को चीन-केंद्रित आर्थिक और तकनीकी व्यवस्था बनने से रोका जाए, जबकि उसके मंच का इस्तेमाल भारतीय उद्योग, तकनीक और Global South में भारत की भूमिका बढ़ाने के लिए भी किया जाए।

यानी दिल्ली में जिनपिंग ने जो पांच बीज बोए हैं, उनका असर तुरंत दिखाई नहीं देगा। लेकिन 2027 में जब BRICS की कमान बीजिंग के हाथ में होगी, तब यही पांच प्रस्ताव समूह की दिशा पर चीन के प्रभाव को परखने का महत्वपूर्ण पैमाना जरूर बन सकते हैं।