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SC की फटकार का बड़ा असर: छात्र को 5 लाख का नोटिस देने वाला मजिस्ट्रेट सस्पेंड, CJI ने पूछा था- ‘आपकी हिम्मत कैसे हुई?’

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी के अगले ही दिन ग्रेटर नोएडा के उस एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया, जिसने जंतर-मंतर के प्रदर्शन में शामिल गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट को गुरुवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह जानकारी दी।

मामला तब तूल पकड़ गया था जब सामने आया कि छात्र को यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बावजूद जारी किया गया था, जिसमें प्रदर्शन से जुड़े छात्रों के खिलाफ आगे दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया गया था। बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस कार्रवाई पर बेहद सख्त टिप्पणी की थी।

5 लाख रुपये के बॉन्ड का नोटिस क्यों दिया गया था?

गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के दूसरे वर्ष के बीए-एलएलबी छात्र अक्षत त्रिपाठी को 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के तृतीय एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था। इसमें उनसे छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानती बॉन्ड देने को कहा गया था।

नोटिस पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर BNSS की संबंधित धाराओं के तहत जारी किया गया था। पुलिस की ओर से आरोप लगाया गया था कि त्रिपाठी दूसरे छात्रों को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे और कथित तौर पर सरकार विरोधी एवं भ्रामक बातें फैला रहे थे। पुलिस ने इसे सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था के लिए संभावित खतरे से जोड़ा था।

हालांकि अक्षत त्रिपाठी ने इन आरोपों से इनकार किया। उनका कहना है कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्वक हिस्सा लिया था और नोटिस जारी करने के आधार को लेकर सवाल उठाए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी?

यह मामला इसलिए गंभीर हो गया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को CJP से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के मामलों में हस्तक्षेप करते हुए छात्रों के खिलाफ आगे दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद 4 सितंबर को अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किया गया।

बुधवार को मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो CJI सूर्यकांत ने पूछा कि जब अदालत का आदेश स्पष्ट था और छात्रों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक थी, तब कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस कैसे जारी कर दिया। अदालत ने इस पर संबंधित प्रशासन से जवाब मांगने की बात कही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश का पालन प्रशासनिक अधिकारियों के लिए बाध्यकारी है। अदालत की टिप्पणी का सार यही था कि जब छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई रोकने का स्पष्ट निर्देश मौजूद था, तो उसके विपरीत कदम उठाने का अधिकार किसी मजिस्ट्रेट के पास नहीं था।

अगले दिन ही सामने आया सस्पेंशन का अपडेट

गुरुवार की सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस जारी करने वाले एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को सरकार ने निलंबित कर दिया है। इसके साथ ही छात्र को जारी किया गया नोटिस पहले ही वापस लिया जा चुका था।

सुप्रीम कोर्ट में छात्र की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पीवी दिनेश ने मामले में अदालत के हस्तक्षेप की मांग की। उनका कहना था कि इस कार्रवाई को लेकर स्पष्ट संदेश जाना चाहिए। वहीं सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से कहा कि मामले को सनसनीखेज बनाने की जरूरत नहीं है।

छात्र का सवाल- नोटिस वापस हुआ, लेकिन आधार क्या था?

नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद अक्षत त्रिपाठी ने सवाल उठाया है कि आखिर उन्हें नोटिस जारी करने का आधार क्या था। उनका कहना है कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और नोटिस में लगाए गए आरोपों को ठोस आधार से साबित नहीं किया गया है।

त्रिपाठी ने अपनी याचिका में यह भी तर्क दिया कि उनके खिलाफ की गई कार्रवाई उनके मौलिक अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के विपरीत थी। उन्होंने अदालत से इस पूरे घटनाक्रम की जांच और हस्तक्षेप की मांग की है।

मामला सिर्फ एक नोटिस का नहीं, अदालत के आदेश के पालन का भी

इस पूरे घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल खड़ा किया है—जब सर्वोच्च अदालत किसी मामले में स्पष्ट निर्देश देती है, तो निचले स्तर के प्रशासनिक अधिकारी उस आदेश को किस हद तक और किस तरीके से लागू कर सकते हैं।

यहां विवाद केवल 5 लाख रुपये के बॉन्ड वाले नोटिस तक सीमित नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट के सामने असली सवाल यह था कि क्या उसके स्पष्ट आदेश के बाद भी किसी छात्र के खिलाफ उसी प्रदर्शन से संबंधित कार्रवाई की जा सकती है।

इसी वजह से अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया और प्रशासन से जवाब तलब किया। अब संबंधित अधिकारी के निलंबन की जानकारी सामने आने के बाद इस मामले में प्रशासनिक जिम्मेदारी तय किए जाने की दिशा में भी कार्रवाई होती दिख रही है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल नोटिस वापस लिया जा चुका है और संबंधित एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को निलंबित किए जाने की जानकारी सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी जा चुकी है। हालांकि अक्षत त्रिपाठी की याचिका और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इस पूरे घटनाक्रम के बाकी पहलुओं पर सुनवाई आगे भी हो सकती है।

इस मामले ने एक बार फिर यह बहस सामने ला दी है कि प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए। खास तौर पर छात्र आंदोलनों और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में अदालत की हालिया टिप्पणियां आने वाले मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा सकती हैं।