नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘नाराज फूफा’ वाले तंज पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तीखा पलटवार किया है। खरगे ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री युवाओं के सवालों का सामना करने के बजाय विपक्ष को नए-नए नाम देकर राजनीतिक बहस को दूसरी दिशा में ले जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विशेषण बदलते रहते हैं, लेकिन जिन नीतियों को लेकर विपक्ष सवाल उठाता है, वे सवाल अपनी जगह बने हुए हैं।
खरगे की यह प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री मोदी के दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) के शताब्दी समारोह में दिए भाषण के एक दिन बाद आई है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में उन लोगों पर कटाक्ष किया था, जो सरकार के किसी भी बड़े काम की शुरुआत पर सवाल खड़े करते हैं। मोदी ने ऐसे आलोचकों की तुलना ‘नाराज फूफा’ से की थी, जिनका हर काम पर सवाल होता है—‘इसकी जरूरत क्या है?’
खरगे बोले- युवाओं से संवाद का मौका राजनीतिक भाषण में बदल गया
कांग्रेस अध्यक्ष ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रधानमंत्री पर निशाना साधा। खरगे के मुताबिक, SRCC देश के युवाओं से संवाद करने और शिक्षा तथा उनके भविष्य से जुड़े मुद्दों पर बात करने का महत्वपूर्ण मंच था। लेकिन उनके आरोप के अनुसार प्रधानमंत्री का भाषण एक बार फिर राजनीतिक अभियान जैसा हो गया।
खरगे ने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष और आलोचना की अपनी भूमिका होती है। उनके मुताबिक, सवाल पूछने वालों को अलग-अलग विशेषण देकर उनकी बात को खारिज करने के बजाय सरकार को उन सवालों का जवाब देना चाहिए।
‘नाराज फूफा’, ‘दिमागी नक्सल’ से लेकर ‘आंदोलनजीवी’ तक
खरगे ने अपने बयान में प्रधानमंत्री और बीजेपी की ओर से विपक्ष तथा आलोचकों के लिए इस्तेमाल किए गए कई पुराने शब्दों का भी जिक्र किया। उन्होंने ‘नाराज फूफा’, ‘दिमागी नक्सल’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘खान मार्केट गैंग’, ‘आंदोलनजीवी’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्द गिनाते हुए कहा कि राजनीतिक बहस में नाम बदलते रहे हैं, लेकिन सरकार की नीतियों पर उठने वाले सवाल खत्म नहीं हुए।
खरगे का तर्क है कि इस तरह की शब्दावली के जरिए असहमति को राजनीतिक पहचान में बदलने की कोशिश होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे वास्तविक मुद्दों पर चर्चा पीछे चली जाती है।
पीएम मोदी ने ‘नाराज फूफा’ कहकर क्या कहा था?
दरअसल, SRCC के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं से कहा था कि कॉलेज परिसर के बाहर उन्हें एक नई दुनिया देखने को मिलेगी, जहां अलग-अलग तरह के लोग मिलेंगे। इसी क्रम में उन्होंने ऐसे लोगों का जिक्र किया जो किसी भी नए काम की शुरुआत पर सवाल उठाते हैं।
प्रधानमंत्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा, हाई-स्पीड ट्रेन, UPI, सेमीकंडक्टर निर्माण और नए संसद भवन जैसी पहलों के समय भी कुछ लोगों ने पूछा था कि इसकी जरूरत क्या है। उन्होंने ऐसे आलोचकों को ‘नाराज फूफा’ की उपमा दी।
प्रधानमंत्री का तर्क था कि देश में कोई बड़ा काम शुरू होते ही उसका विरोध करने के बजाय उसके उद्देश्य और संभावित परिणाम को देखना चाहिए। उन्होंने इसे भारत के विकास को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा कि देश अब अपनी जरूरत के हिसाब से बड़े फैसले लेने में सक्षम है।
‘नाराज फूफा’ के साथ ‘दिमागी नक्सल’ भी बना चर्चा का विषय
प्रधानमंत्री के भाषण में सिर्फ ‘नाराज फूफा’ ही चर्चा का विषय नहीं बना। उन्होंने आलोचनात्मक मानसिकता के संदर्भ में ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्द का भी इस्तेमाल किया। विपक्षी दलों ने इसे लेकर भी प्रधानमंत्री पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि शैक्षणिक संस्थान में युवाओं को संबोधित करने के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने के लिए किया गया।
वहीं प्रधानमंत्री के भाषण का व्यापक संदर्भ सिर्फ विपक्ष पर हमला नहीं था। उन्होंने 2013 में SRCC में दिए अपने पुराने भाषण को याद किया और उस समय की भारतीय अर्थव्यवस्था तथा मौजूदा स्थिति के बीच तुलना की। प्रधानमंत्री ने हालिया 7.8 प्रतिशत GDP वृद्धि का हवाला देते हुए विपक्ष पर आरोप लगाया कि उसे देश की आर्थिक प्रगति स्वीकार नहीं हो रही।
खरगे ने रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे भी उठाए
खरगे ने प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए युवाओं से जुड़े वास्तविक मुद्दों का सवाल उठाया। कांग्रेस की ओर से बेरोजगारी, पेपर लीक, सरकारी भर्तियों, महंगी शिक्षा और छात्रवृत्ति जैसे विषयों को लेकर सरकार से जवाब मांगने की बात कही गई है।
यानी विवाद केवल एक राजनीतिक जुमले तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच यह पुरानी बहस भी है कि युवाओं और छात्रों के सामने मौजूद समस्याओं पर राजनीतिक नेतृत्व को किस तरह जवाब देना चाहिए।
‘आउटरीच’ पर भी खरगे का तंज
खरगे ने प्रधानमंत्री के SRCC दौरे को लेकर ‘आउटरीच’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए भी तंज कसा। उनका कहना था कि आउटरीच की जरूरत तभी पड़ती है, जब कोई ‘आउट ऑफ रीच’ हो जाए। इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने प्रधानमंत्री और सरकार पर जनता तथा युवाओं से दूरी बनाने का आरोप लगाने की कोशिश की।
कांग्रेस अध्यक्ष की यह प्रतिक्रिया बताती है कि ‘नाराज फूफा’ वाला बयान आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी का एक और मुद्दा बन सकता है।
13 साल बाद SRCC पहुंचे थे पीएम मोदी
प्रधानमंत्री मोदी का SRCC दौरा इसलिए भी राजनीतिक रूप से चर्चा में रहा क्योंकि वह करीब 13 साल बाद इस संस्थान में पहुंचे थे। वर्ष 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने इसी कॉलेज में युवाओं को संबोधित किया था। उस समय वह राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के तौर पर तेजी से उभर रहे थे।
इस बार शताब्दी समारोह के मंच से उन्होंने 2013 और आज के भारत की आर्थिक स्थिति की तुलना की। इसी भाषण में उन्होंने युवाओं से सकारात्मक सोच रखने और देश के विकास में अपनी भूमिका निभाने की अपील भी की।
बयानबाजी से आगे अब असली सवाल मुद्दों का
‘नाराज फूफा’ पर शुरू हुई यह सियासी बहस फिलहाल शब्दों के आदान-प्रदान तक पहुंच गई है। प्रधानमंत्री ने जहां इसे उन लोगों पर कटाक्ष के तौर पर इस्तेमाल किया जो हर नई पहल में कमियां तलाशते हैं, वहीं कांग्रेस इसे विपक्ष और आलोचना को बदनाम करने की राजनीतिक रणनीति बता रही है।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों पक्ष युवाओं और देश के भविष्य की बात कर रहे हैं, लेकिन दोनों का राजनीतिक संदेश अलग है। सरकार विकास और उपलब्धियों को सामने रख रही है, जबकि विपक्ष रोजगार, शिक्षा और जवाबदेही जैसे सवालों को केंद्र में लाना चाहता है।
अब देखना होगा कि यह विवाद केवल ‘नाराज फूफा’ बनाम ‘नए विशेषण’ की राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या आने वाले दिनों में इसके साथ जुड़े वास्तविक मुद्दे—रोजगार, शिक्षा, आर्थिक वृद्धि और युवाओं की अपेक्षाएं—बहस के केंद्र में आते हैं।


