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नेपाल में बाढ़ की दूसरी लहर का खतरा, 400 से ज्यादा कंटेनर बहने की आशंका; 1000 से अधिक लोगों का अब तक पता नहीं

काठमांडू/रसुवा। नेपाल में भोटेकोशी नदी के उफान से मची तबाही का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। रसुवा जिले में आई भीषण फ्लैश फ्लड ने सड़क, पुल, व्यापारिक ढांचे और नदी किनारे मौजूद बस्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया है। अब परिवहन कारोबार से जुड़े लोगों ने दावा किया है कि 400 से ज्यादा कंटेनर ट्रक बाढ़ की चपेट में आए हैं और उनमें काम करने वाले 1,000 से अधिक लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है।

हालांकि, यह संख्या फिलहाल परिवहन कारोबारियों की ओर से दी गई जानकारी पर आधारित है। नेपाल की आपदा एजेंसियों के आंकड़े अलग-अलग समय पर बदल रहे हैं, क्योंकि दुर्गम इलाकों तक पहुंच और संचार व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है।

भोटेकोशी का सैलाब बना कारोबार के लिए भी तबाही

रसुवा-ग्यिरोंग सीमा और त्रिशूली कॉरिडोर नेपाल के लिए महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में शामिल हैं। इसी रास्ते से चीन की ओर से नेपाल में सामान पहुंचता है। बाढ़ के दौरान इस कॉरिडोर पर मौजूद बड़ी संख्या में कंटेनर ट्रक प्रभावित हुए।

नेपाल ट्रक कंटेनर ट्रांसपोर्टेशन सर्विस के अध्यक्ष अर्जुन बहादुर सापकोटा के मुताबिक, 400 से अधिक कंटेनर और उनसे जुड़े ड्राइवर, हेल्पर, मजदूर तथा कारोबारी अब तक संपर्क से बाहर हैं। इन ट्रकों में त्योहारों के मौसम के लिए सामान लाया जा रहा था।

यानी इस आपदा का असर सिर्फ लोगों की जिंदगी तक सीमित नहीं है। नेपाल के सीमावर्ती व्यापार और सप्लाई चेन पर भी इसका बड़ा असर पड़ सकता है।

रसुवा-ग्यिरोंग सड़क मार्ग बुरी तरह तबाह

बाढ़ ने रसुवागढ़ी-टिमुरे-स्याब्रुबेसी सड़क खंड को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 80 कंटेनर चालक अपने वाहनों के साथ चीन के केरुंग इलाके में फंसे हुए हैं और तीन दिनों से नेपाल लौटने का इंतजार कर रहे हैं।

इससे साफ है कि सीमा क्षेत्र में हालात सामान्य नहीं हुए हैं। एक तरफ नेपाल में बचाव अभियान चल रहा है, तो दूसरी तरफ सीमा के दूसरी ओर फंसे चालक और कारोबारी भी सुरक्षित वापसी की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

सिर्फ कंटेनर नहीं, हजारों लोगों की जिंदगी पर संकट

भोटेकोशी नदी में आई अचानक बाढ़ ने नेपाल के रसुवा क्षेत्र को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। शुरुआती रिपोर्टों में सैकड़ों पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई थी। इनमें कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले भारतीय नागरिक भी शामिल हैं।

बीते दो दिनों में लापता लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। शुक्रवार को नेपाल और चीन की सीमा से जुड़े इलाकों में लगभग 2,000 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई, हालांकि अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़ों में अंतर है।

तबाही के बाद अब नई बाढ़ का खतरा

सबसे बड़ी चिंता यह है कि पहली बाढ़ के बाद खतरा खत्म नहीं हुआ है। फ्लैश फ्लड से मलबा और चट्टानें जमा होने के कारण नदी के रास्ते में एक अस्थायी झील जैसी संरचना बन गई है। इसके जलस्तर में बढ़ोतरी के बाद नेपाल और चीन दोनों ने निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क किया है।

शुक्रवार को कुछ समय के लिए हेलीकॉप्टर से चलाए जा रहे बचाव अभियान को भी रोकना पड़ा, क्योंकि पानी बढ़ने की आशंका पैदा हो गई थी। बाद में बचाव कार्य फिर शुरू किया गया।

ग्लेशियर टूटने के बाद आया था विनाशकारी सैलाब

रिपोर्टों के अनुसार, इस आपदा की शुरुआत हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने/बड़े पैमाने पर मलबा खिसकने की घटना से हुई, जिसके बाद पानी, बर्फ, चट्टान और मिट्टी का भारी प्रवाह नदी तंत्र में आ गया। इसने रास्ते में आने वाले पुलों, सड़कों, बस्तियों और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को अपनी चपेट में ले लिया।

आपदा की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नेपाल में हजारों सुरक्षाकर्मी और बचावकर्मी अभियान में जुटे हैं। शुक्रवार तक हजारों लोगों को सुरक्षित निकाले जाने की जानकारी सामने आई थी, लेकिन दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण तलाशी अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

नेपाल के सामने अब दोहरी चुनौती

नेपाल के लिए इस समय चुनौती केवल लापता लोगों को खोजने की नहीं है। रसुवा और आसपास के इलाकों में सड़क संपर्क बहाल करना, सीमा व्यापार को दोबारा शुरू करना, फंसे हुए लोगों को निकालना और संभावित दूसरी बाढ़ से निचले इलाकों को बचाना भी बड़ी प्राथमिकता बन गई है।

400 से ज्यादा कंटेनरों के नुकसान की खबर सही साबित होती है तो यह नेपाल के सीमा व्यापार और परिवहन क्षेत्र के लिए भी बड़ा झटका होगा। वहीं 1,000 से ज्यादा लोगों के संपर्क से बाहर होने की सूचना ने इस त्रासदी को और गंभीर बना दिया है।

फिलहाल राहत और बचाव एजेंसियां मलबे में जिंदगी तलाश रही हैं। लेकिन पहाड़ों से घिरे इस इलाके में मौसम, टूटी सड़कें और लगातार बढ़ता जलस्तर अभियान की राह में बड़ी बाधा बने हुए हैं।