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सोनिया गांधी की किताब पर बड़ा विवाद: मोदी, RSS और चीन वाले हिस्सों पर क्यों अटकी पेंगुइन? प्रकाशक से टूटी डील

नई दिल्ली। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित किताब ‘Belonging: A Journey of Love’ भारत में प्रकाशित होने से पहले ही विवादों में घिर गई है। किताब को लेकर पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया और सोनिया गांधी के बीच सहमति नहीं बन सकी। रिपोर्टों के मुताबिक, विवाद किताब के कुछ राजनीतिक हिस्सों को लेकर हुआ, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, RSS, BJP और भारत-चीन संबंधों से जुड़े संदर्भ शामिल हैं।

बताया जा रहा है कि प्रकाशक की ओर से किताब के कुछ अंशों में बदलाव या उन्हें हटाने का सुझाव दिया गया था। सोनिया गांधी ने इन बदलावों को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद भारत में किताब के प्रकाशन को लेकर पेंगुइन के साथ बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी। हालांकि, इस पूरे मामले में पेंगुइन की तरफ से अलग तस्वीर पेश की गई है।

आखिर किताब के किन हिस्सों पर था विवाद?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पेंगुइन इंडिया की आपत्तियां मुख्य रूप से उन हिस्सों को लेकर थीं जिनमें सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी मुलाकातों और उनके राजनीतिक कार्यकाल पर अपने विचार दर्ज किए हैं।

रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि किताब में सोनिया गांधी ने मोदी की तुलना दूसरे प्रधानमंत्रियों से की है। इसके अलावा RSS और भारत-चीन संबंधों से जुड़े कुछ संदर्भ भी विवाद का हिस्सा बताए जा रहे हैं। हालांकि, RSS या चीन से संबंधित सटीक अंश क्या हैं, इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, बातचीत के अंतिम दौर में तीन-चार महत्वपूर्ण पैराग्राफ को लेकर सहमति नहीं बन सकी और सोनिया गांधी उन्हें हटाने के लिए तैयार नहीं हुईं।

सोनिया गांधी का रुख क्या है?

मामले से जुड़े लोगों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, सोनिया गांधी अपने संस्मरण में अपने राजनीतिक जीवन और उससे जुड़े अनुभवों को अपने तरीके से रखने पर कायम रहीं। उनका तर्क बताया जा रहा है कि यह उनका व्यक्तिगत संस्मरण है और इसमें प्रधानमंत्री सहित दूसरे राजनीतिक नेताओं के साथ उनके अनुभव और उनकी राजनीतिक समझ स्वाभाविक रूप से शामिल होगी।

यही वह बिंदु है जहां मामला सिर्फ एक किताब के प्रकाशन से आगे बढ़कर लेखक की स्वतंत्रता बनाम प्रकाशक की संपादकीय जिम्मेदारी की बहस बन गया है।

पेंगुइन ने क्या सफाई दी?

पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने इस पूरे घटनाक्रम पर सफाई देते हुए कहा है कि वह सोनिया गांधी की किताब का आधिकारिक भारतीय प्रकाशक नहीं है। कंपनी के मुताबिक, प्रकाशन प्रक्रिया में तथ्य-जांच करना और लेखक को संपादकीय सुझाव देना प्रकाशक की सामान्य जिम्मेदारी है।

कंपनी ने यह भी कहा कि बातचीत के दौरान वह किताब को प्रकाशित करने में रुचि रखती थी, लेकिन बाद में परिस्थितियां ऐसी रहीं कि प्रकाशन आगे नहीं बढ़ सका।

यानी पेंगुइन ने सीधे तौर पर यह स्वीकार नहीं किया है कि उसने राजनीतिक दबाव या किसी खास राजनीतिक विचारधारा के कारण किताब से हिस्से हटाने की मांग की थी।

किताब में क्या खास है?

‘Belonging: A Journey of Love’ को सोनिया गांधी के जीवन और उनके राजनीतिक सफर का संस्मरण बताया जा रहा है। इसमें उनके निजी जीवन, भारत आने, राजीव गांधी से रिश्ते और बाद में भारतीय राजनीति में उनकी भूमिका से जुड़े अनुभवों के सामने आने की उम्मीद है।

किताब को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सोनिया गांधी ने भारतीय राजनीति में करीब तीन दशक तक कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में उनके संस्मरण से उनके निजी अनुभवों के साथ-साथ कई राजनीतिक घटनाओं को लेकर उनका नजरिया सामने आने की संभावना है।

अब कौन प्रकाशित करेगा किताब?

पेंगुइन इंडिया के साथ बातचीत टूटने के बाद भारत में किताब प्रकाशित करने के लिए दूसरे प्रकाशकों की दिलचस्पी सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार हार्पर कॉलिन्स इस किताब को भारत में प्रकाशित करने की दौड़ में आगे है। हालांकि, अंतिम प्रकाशक को लेकर आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किताब के प्रकाशन की योजना पहले से तय है। अमेरिकी प्रकाशक Alfred A. Knopf की ओर से किताब के 10 नवंबर 2026 को वैश्विक स्तर पर जारी होने की जानकारी सामने आई है। शुरुआती प्रिंट रन करीब एक लाख प्रतियों का बताया गया है।

कांग्रेस और BJP के बीच भी छिड़ी बहस

किताब को लेकर विवाद सामने आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। कांग्रेस से जुड़े नेताओं ने पेंगुइन की फैक्ट-चेक वाली दलील पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर BJP नेता अमित मालवीय ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए किताब में शामिल दावों और तथ्यों को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

इससे साफ है कि किताब के बाजार में आने से पहले ही उसने भारतीय राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है।

विवाद का असली सवाल क्या है?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या किसी राजनीतिक संस्मरण में लेखक के व्यक्तिगत अनुभव और राजनीतिक आकलन को संपादकीय प्रक्रिया के तहत बदला जा सकता है?

प्रकाशक का कहना है कि तथ्य-जांच और संपादकीय सुझाव प्रकाशन की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। दूसरी ओर, सोनिया गांधी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, विवादित हिस्से उनके राजनीतिक अनुभव और नजरिए का हिस्सा हैं और उन्हें हटाने से किताब का मूल स्वर प्रभावित हो सकता है।

फिलहाल किताब के विवादित अंश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पेंगुइन की आपत्ति किसी राजनीतिक दबाव की वजह से थी या सामान्य संपादकीय प्रक्रिया का हिस्सा।

लेकिन इतना जरूर है कि सोनिया गांधी की किताब अब सिर्फ एक संस्मरण नहीं रह गई है। उसके प्रकाशित होने से पहले ही वह भारतीय राजनीति, प्रकाशन जगत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच एक दिलचस्प बहस का केंद्र बन चुकी है।