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ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की मौत पर भारत की शुरुआती चुप्पी: क्या हो सकती है कूटनीतिक रणनीति?

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ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं, लेकिन भारत की शुरुआती चुप्पी ने कूटनीतिक हलकों में चर्चा को जन्म दिया। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के दौरान शनिवार को ख़ामेनेई की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद भारत की ओर से औपचारिक प्रतिक्रिया आने में लगभग पाँच दिन का समय लगा।

गुरुवार को भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर शोक व्यक्त किया और शोक-पुस्तिका में भारत की ओर से संवेदना संदेश भी लिखा। इसके साथ ही भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई। इससे पहले भारत सरकार की ओर से कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया था, जिस कारण राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर कई सवाल उठे।

हालांकि युद्ध की शुरुआत के दिन भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सय्यद अब्बास अराग़ची से फोन पर बातचीत की थी। उस बातचीत के बाद जारी आधिकारिक प्रेस नोट में भारत ने क्षेत्रीय स्थिति पर चर्चा का उल्लेख किया, लेकिन न तो ख़ामेनेई के निधन पर शोक जताने की बात कही गई और न ही अमेरिका-इज़राइल के हमले पर कोई प्रत्यक्ष टिप्पणी की गई।

भारत की इस सावधानीपूर्ण प्रतिक्रिया को कई विशेषज्ञ संतुलित कूटनीति के रूप में देख रहे हैं। भारत के ईरान, अमेरिका और इज़राइल—तीनों देशों के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। ऐसे में किसी भी पक्ष के खिलाफ तत्काल टिप्पणी करने से क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता था। इसलिए भारत ने पहले स्थिति का आकलन करने के बाद औपचारिक संवेदना व्यक्त करना उचित समझा।

इसी मुद्दे को लेकर भारत में विपक्षी दलों ने सरकार से सवाल भी किए हैं और कहा है कि ईरान जैसे महत्वपूर्ण साझेदार देश के सर्वोच्च नेता की मौत पर भारत की प्रतिक्रिया देर से आई।

तुलना के तौर पर देखा जाए तो वर्ष 2024 में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु के बाद भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी थी और पूरे देश में एक दिन का राजकीय शोक भी घोषित किया गया था।

कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और बड़े वैश्विक शक्तियों की भागीदारी को देखते हुए भारत ने इस बार अधिक संतुलित और सावधानीपूर्ण रुख अपनाया। आने वाले समय में क्षेत्रीय घटनाक्रम और भारत की आधिकारिक नीति इस पूरे मामले को और स्पष्ट कर सकती है।