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मदीना के बाद यानबू में अरामको टर्मिनल पर हमला, सऊदी-हूती तनाव ने बढ़ाई तेल सप्लाई की चिंता

रियाद: सऊदी अरब में पिछले कुछ दिनों के दौरान हुए दो अलग-अलग हमलों ने क्षेत्रीय सुरक्षा और तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने मदीना के तैबा पावर डिस्ट्रीब्यूशन स्टेशन पर ड्रोन हमले के लिए यमन के हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया है। यह स्टेशन पैगंबर की मस्जिद यानी मस्जिद-ए-नबवी को बिजली की आपूर्ति करता है। दूसरी ओर, यानबू के अरामको तेल टर्मिनल के भीतर 1 अक्टूबर को एक अज्ञात प्रोजेक्टाइल गिरने और आग लगने की खबर सामने आई है।

दोनों घटनाएं ऐसे समय में हुई हैं, जब सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव फिर से तेज हुआ है। हालांकि, दोनों घटनाओं को एक ही हमलावर से जोड़ना अभी जल्दबाजी होगी। मदीना हमले में हूतियों पर सऊदी गठबंधन का आरोप है, जिसे हूती पक्ष ने खारिज किया है; जबकि यानबू घटना में हमलावर की पहचान अभी सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं हुई है।

मदीना में पावर स्टेशन पर क्या हुआ?

सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलिकी के मुताबिक, 29 सितंबर की सुबह करीब 5:11 बजे मदीना स्थित तैबा पावर डिस्ट्रीब्यूशन स्टेशन को ड्रोन से निशाना बनाया गया।

गठबंधन का दावा है कि हमले में स्टेशन का एक ट्रांसफॉर्मर क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन इससे व्यापक बिजली नेटवर्क प्रभावित नहीं हुआ। यह स्टेशन मस्जिद-ए-नबवी को बिजली उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था का हिस्सा है।

सऊदी पक्ष ने कहा है कि ड्रोन के मलबे की जांच और घटना की समीक्षा के बाद हूती विद्रोहियों की भूमिका सामने आई। सऊदी गठबंधन ने इसे गंभीर हमला बताते हुए हूतियों पर पवित्र स्थलों के आसपास खतरा पैदा करने का आरोप लगाया।

हालांकि, हूती पक्ष ने इस आरोप को साफ तौर पर खारिज किया है। हूती संचालित सबा समाचार एजेंसी के हवाले से रिपोर्टों में कहा गया कि सऊदी अरब का आरोप गलत है।

यानबू में अरामको के तेल टर्मिनल में लगी आग

मदीना की घटना के बीच 1 अक्टूबर को यानबू के बंदरगाह में सऊदी अरामको के तेल टर्मिनल के पास एक और घटना सामने आई।

Maritime Executive और maritime-security रिपोर्टों के मुताबिक, एक अज्ञात प्रोजेक्टाइल यानबू पोर्ट के भीतर गिरा, जिसके बाद टैंक फार्म के आसपास आग दिखाई दी। घटना के बाद कुछ समय के लिए तेल लोडिंग ऑपरेशन प्रभावित होने की खबर है।

हालांकि, यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरामको या बंदरगाह अधिकारियों की ओर से अभी तक सार्वजनिक रूप से यह पुष्टि नहीं हुई कि प्रोजेक्टाइल किसने दागा था। इसलिए इस घटना को सीधे हूती हमला बताना फिलहाल तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

यानबू टर्मिनल सऊदी अरब के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह लाल सागर के किनारे स्थित है और देश की तेल निर्यात व्यवस्था में इसकी अहम भूमिका है।

यानबू इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

यानबू की अहमियत सिर्फ एक तेल टर्मिनल होने तक सीमित नहीं है। यह सऊदी अरब की East-West Pipeline यानी Petroline के पश्चिमी छोर पर स्थित प्रमुख निर्यात केंद्र है।

यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को लाल सागर के तट तक पहुंचाती है। इसके जरिए सऊदी अरब अपने कुछ तेल निर्यात को हॉर्मुज जलडमरूमध्य से अलग रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक भेज सकता है।

यही वजह है कि यानबू के आसपास किसी भी तरह की सुरक्षा घटना का असर सिर्फ सऊदी अरब तक सीमित नहीं माना जाता। लंबे समय तक आपूर्ति बाधित होने पर इसका असर क्षेत्रीय और वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ सकता है।

इससे पहले भी तेल पाइपलाइन पर हुआ था ड्रोन हमला

यानबू में ताजा घटना से पहले सऊदी अरब की East-West Pipeline पर भी ड्रोन हमले हुए थे। सितंबर में हुए हमले के बाद पाइपलाइन के कुछ हिस्सों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था।

इसका असर यानबू से होने वाले तेल लोडिंग ऑपरेशन पर भी पड़ा। बाद में सऊदी अरामको ने पाइपलाइन और यानबू से तेल निर्यात को धीरे-धीरे बहाल किया।

अरामको की यूरोपीय ग्राहकों को अक्टूबर में कुछ कच्चे तेल की डिलीवरी रोकने की रिपोर्ट भी सामने आई थी। ऐसे में यानबू की सुरक्षा को लेकर नया घटनाक्रम तेल बाजार के लिए अतिरिक्त चिंता पैदा करता है।

क्या हूतियों ने यानबू को भी निशाना बनाया?

यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि हूती विद्रोहियों ने पहले यानबू और सऊदी तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने के दावे किए हैं।

24 सितंबर को हूती पक्ष ने रियाद और यानबू में सऊदी अरामको से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया था। उस समय सऊदी पक्ष ने यानबू क्षेत्र की ओर दागी गई मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने की बात कही थी, लेकिन रियाद या यानबू में नुकसान की तत्काल पुष्टि नहीं हुई थी।

लेकिन 1 अक्टूबर की यानबू घटना को लेकर तस्वीर अलग है। उपलब्ध रिपोर्टों में अज्ञात प्रोजेक्टाइल की बात है और किसी संगठन की जिम्मेदारी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे हूती हमला कहना अभी जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकालना होगा।

मदीना के बाद सऊदी-हूती तनाव और बढ़ा

मदीना की घटना के बाद सऊदी समर्थित यमनी बलों की ओर से हूती ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की खबरें भी सामने आईं।

आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, यमन के ताइज़ प्रांत में हूती ठिकानों के खिलाफ कुछ घंटों के भीतर कई हवाई हमले किए जाने की जानकारी दी गई। दूसरी ओर, हूती पक्ष ने भी सऊदी हमलों का दावा किया, जिसकी तत्काल स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई।

इस तरह दोनों पक्षों के दावों और जवाबी कार्रवाइयों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

पवित्र शहर और तेल प्रतिष्ठान—दो अलग संवेदनशील मोर्चे

मदीना और यानबू की घटनाओं ने सऊदी अरब के सामने सुरक्षा की दो अलग-अलग चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

मदीना धार्मिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील शहर है, जबकि यानबू सऊदी अर्थव्यवस्था और तेल निर्यात के लिहाज से रणनीतिक महत्व रखता है। दोनों जगहों पर सुरक्षा घटनाएं होने से सऊदी अरब को एक साथ धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा पर ध्यान देना पड़ रहा है।

मदीना मामले में जहां आरोप और इनकार दोनों सामने आ चुके हैं, वहीं यानबू मामले की जांच अभी बाकी है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि यानबू में हुआ हमला किसने किया और इससे तेल टर्मिनल के संचालन पर कितना असर पड़ा। इसके साथ ही मदीना हमले को लेकर सऊदी गठबंधन और हूती पक्ष के परस्पर विरोधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी महत्वपूर्ण होगी।

इतना जरूर है कि लाल सागर के आसपास बढ़ता सैन्य तनाव अब धार्मिक स्थलों के साथ-साथ ऊर्जा ढांचे के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। अगर यानबू जैसे रणनीतिक तेल केंद्रों पर हमलों की घटनाएं बढ़ती हैं, तो इसका असर सऊदी अरब की निर्यात क्षमता और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार दोनों पर पड़ सकता है।

अभी के लिए यानबू हमले की जिम्मेदारी तय नहीं हुई है और मदीना हमले में हूतियों की भूमिका सऊदी पक्ष के दावे के रूप में सामने आई है, जिसे हूती संगठन ने खारिज किया है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम पर आगे आने वाली आधिकारिक जांच और स्वतंत्र पुष्टि पर नजर रखना जरूरी होगा।