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BRICS में ‘एक करेंसी’ का सपना अभी दूर! भारत ने साफ किया रुख, बताया कैसे बनी नई दिल्ली डिक्लेरेशन पर सहमति

नई दिल्ली: BRICS शिखर सम्मेलन के बीच जिस मुद्दे ने सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय दिलचस्पी पैदा की थी, उस पर भारत ने तस्वीर साफ कर दी है। क्या BRICS देश मिलकर एक साझा मुद्रा लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं? भारत ने इसका सीधा जवाब दिया है—फिलहाल ऐसी कोई साझा BRICS करेंसी लाने का प्रस्ताव नहीं है।

विदेश मंत्रालय में आर्थिक संबंधों के सचिव सुधाकर दलेला ने नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन के बाद स्पष्ट किया कि संगठन के भीतर साझा मुद्रा बनाने का कोई प्रस्ताव फिलहाल मौजूद नहीं है। हालांकि, सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान को बढ़ावा देने की चर्चा जारी है। इसका मकसद लेन-देन की लागत घटाना और सीमा-पार भुगतान को अधिक सुगम बनाना है।

यानी BRICS की दिशा फिलहाल कोई नई संयुक्त मुद्रा छापने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है जिसमें भारत-रूस, भारत-चीन या दूसरे सदस्य देशों के बीच कारोबार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ सके।

साझा BRICS करेंसी पर भारत का रुख क्या है?

BRICS के विस्तार के साथ पिछले कुछ वर्षों से एक संभावित साझा मुद्रा को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। खासकर रूस और चीन की ओर से डॉलर पर निर्भरता कम करने की बहस के बीच इस तरह की अटकलों ने जोर पकड़ा।

लेकिन भारत का रुख अपेक्षाकृत व्यावहारिक रहा है। नई दिल्ली किसी ऐसी साझा मुद्रा की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और बेहतर क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम को ज्यादा व्यवहारिक विकल्प मानती है।

सुधाकर दलेला ने भी स्पष्ट किया कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का मुद्दा कोई नया विषय नहीं है। BRICS देशों के बीच इस पर पहले से बातचीत चल रही है।

इसका सीधा अर्थ है कि अभी BRICS के भीतर रुपया, रूबल, युआन, रियाल या किसी अन्य राष्ट्रीय मुद्रा की जगह कोई नई सामूहिक मुद्रा लाने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।

फिर BRICS में हो क्या रहा है?

अगर साझा करेंसी नहीं तो फिर BRICS का आर्थिक एजेंडा क्या है?

इसका जवाब है—स्थानीय मुद्राओं में भुगतान और भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी।

नई दिल्ली घोषणा में सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने की बात कही गई है। साथ ही BRICS Payment Task Force अलग-अलग देशों की भुगतान और मैसेजिंग प्रणालियों को ज्यादा सहज तरीके से जोड़ने के विकल्पों पर काम कर रहा है।

भारत के लिए यह मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे किसी नई साझा मुद्रा की जटिलता के बिना अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लेन-देन की लागत और समय कम किया जा सकता है।

डॉलर से दूरी और BRICS करेंसी में फर्क

यहां एक और बात समझना जरूरी है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना और BRICS की साझा मुद्रा बनाना एक ही बात नहीं है।

यदि दो देश अपने-अपने रुपये और स्थानीय मुद्रा में व्यापार करते हैं तो उन्हें तीसरी मुद्रा के जरिए भुगतान करने की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच कारोबार के लिए एक नई संयुक्त मुद्रा बनाई जा रही है।

इसी अंतर की वजह से “BRICS करेंसी” को लेकर चल रही चर्चाओं को लेकर भारत ने सावधानी बरती है।

नई दिल्ली का जोर एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था पर है जो मौजूदा राष्ट्रीय मुद्राओं और भुगतान प्रणालियों को जोड़ सके। इससे व्यापारिक लेन-देन आसान हो सकता है, जबकि अलग साझा मुद्रा के लिए केंद्रीय बैंक, विनिमय दर, मौद्रिक नीति और वित्तीय स्थिरता जैसे कई जटिल सवाल खड़े होते।

नई दिल्ली डिक्लेरेशन पर कैसे बनी सहमति?

BRICS सम्मेलन की दूसरी बड़ी कहानी साझा घोषणा-पत्र पर बनी सहमति है।

नई दिल्ली घोषणा को अंतिम रूप देने के लिए सदस्य देशों के बीच कई दिनों तक बातचीत चली। रिपोर्टों के मुताबिक BRICS शेरपाओं ने चार दिनों से ज्यादा समय तक दस्तावेज के अलग-अलग हिस्सों पर बातचीत की और शनिवार को सहमति बनाई गई।

सबसे कठिन मुद्दों में पश्चिम एशिया की स्थिति से जुड़ी भाषा भी शामिल थी। BRICS में ऐसे देश शामिल हैं जिनके क्षेत्रीय और रणनीतिक हित कई मामलों में अलग-अलग हैं। ऐसे में संयुक्त दस्तावेज में ऐसी भाषा तैयार करना आसान नहीं था जिसे सभी सदस्य स्वीकार कर सकें।

आखिरकार सदस्यों के बीच सहमति बनी और New Delhi Declaration को सर्वसम्मति से अपनाया गया।

घोषणा-पत्र में क्या-क्या अहम है?

नई दिल्ली घोषणा में आर्थिक और वित्तीय सहयोग के साथ कई वैश्विक मुद्दों को जगह मिली है।

घोषणा में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने, सीमा-पार भुगतान को अधिक तेज, सस्ता और सुरक्षित बनाने तथा BRICS Payment Task Force के काम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

इसके अलावा वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की बेहतर भागीदारी, व्यापार से जुड़ी बाधाओं और एकतरफा शुल्क एवं गैर-टैरिफ उपायों को लेकर भी चिंता जताई गई है।

पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर भी सदस्य देशों ने चिंता जताई और तनाव कम करने तथा बातचीत एवं कूटनीति के जरिए विवादों के समाधान की जरूरत पर जोर दिया।

भारत की अध्यक्षता में 350 से ज्यादा बैठकें

भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान केवल नेताओं का शिखर सम्मेलन ही नहीं हुआ। सालभर अलग-अलग स्तरों पर 350 से अधिक बैठकें और कार्यक्रम आयोजित किए गए।

नई दिल्ली का जोर इस दौरान BRICS को केवल राजनीतिक मंच के बजाय व्यावहारिक आर्थिक और विकासात्मक सहयोग के प्लेटफॉर्म के रूप में आगे बढ़ाने पर रहा। भारत ने संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार तथा ग्लोबल साउथ के देशों की भूमिका बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

इसी लंबी प्रक्रिया का अंतिम राजनीतिक परिणाम नई दिल्ली घोषणा के रूप में सामने आया।

क्या BRICS भविष्य में साझा करेंसी ला सकता है?

फिलहाल इसका कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है।

BRICS में स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और भुगतान प्रणालियों की कनेक्टिविटी पर काम आगे बढ़ रहा है। लेकिन साझा मुद्रा का सवाल आर्थिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बेहद जटिल है।

अलग-अलग BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाओं का आकार, महंगाई, ब्याज दरें, विनिमय दर व्यवस्था और मौद्रिक नीतियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं। इसलिए यूरो जैसी साझा मुद्रा के लिए जिस स्तर का संस्थागत और आर्थिक एकीकरण जरूरी होता है, BRICS अभी वहां नहीं पहुंचा है।

यही वजह है कि भारत फिलहाल “एक नई मुद्रा” के बजाय “बेहतर भुगतान व्यवस्था” को ज्यादा व्यावहारिक रास्ता मानता दिखाई दे रहा है।

भारत के लिए यह रुख क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत लंबे समय से अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। BRICS में रहते हुए भी नई दिल्ली किसी एक वित्तीय या राजनीतिक धुरी के साथ पूरी तरह जुड़ने से बचती है।

स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने का विकल्प भारत को एक तरफ डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने का रास्ता देता है, तो दूसरी तरफ किसी नई सामूहिक BRICS मुद्रा की मौद्रिक व्यवस्था में शामिल होने की जटिलताओं से भी बचाता है।

इसीलिए नई दिल्ली का संदेश फिलहाल साफ है—BRICS में आर्थिक सहयोग बढ़े, भुगतान आसान हो और स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़े, लेकिन साझा BRICS करेंसी की दिशा में अभी कोई प्रस्ताव नहीं है।

और शायद यही इस पूरे सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक कहानी है: BRICS डॉलर का विकल्प खोजने की बहस को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहा, लेकिन भारत उसे किसी नई मुद्रा के बजाय व्यावहारिक भुगतान तंत्र और स्थानीय मुद्रा व्यापार की दिशा में ले जाना चाहता है।